Category: वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर

क्षमापर्व

खम्मामि सव्वजीवाणां, सव्वे जीवा खमन्तु मे। मैं पहले सब जीवों को क्षमा करता हूँ और अपेक्षा रखता हूँ कि सब जीव मुझे भी क्षमा करें।

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उत्तम ब्रह्मचर्य

जब हम आत्मानुराग से भर गये हों, देहासक्ति से ऊपर उठ गये हों, वहीं ब्रह्मचर्य है। परिणामों की अत्यंत निर्मलता का नाम ब्रह्मचर्य है। मुनि

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उत्तम आकिंचन्य

अब कुछ करना नहीं, अब तो भावना और उपाय/साधना के फल आने शुरु हो गये, भरेपन का भाव आने लगा है। सहारे की भावना बुरी

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उत्तम त्याग

अवगुणों को छोड़ने का मन बना लें, उन्हें ग्रहण न करें, इसी का नाम त्याग है। मुनि श्री क्षमासागर जी

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उत्तम तप

विषय-भोग जीवन को मुश्किल में डालते हैं। तपस्या मुश्किल में नहीं डालती । तपस्या तो जीवन को आसान बना देती है। जिसके मन में निरन्तर

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उत्तम संयम

अपने मन-वचन और इन्द्रियों को संयमित कर लेना, नियमित कर लेना, नियन्त्रित कर लेना, इसी का नाम संयम है। यदि हमने अपने जीवन में सत्य-ज्योति

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उत्तम सत्य

जिसका मन जितना सच्चा होगा उसका जीवन भी उतना ही सच्चा होगा। जीवन उन्हीं का सच बनता है जो कषायों से मुक्त हो जाते हैं।

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उत्तम शौच (लोभ न करना)

अपन आनन्द लें उस चीज़ का जो अपने को प्राप्त है। जो अपने पास है वह नहीं दिखता, जो दूसरों के पास है हमें वह

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उत्तम मार्दव (मान नहीं करना)

दूसरों के गुणों में अगर हम आह्लाद महसूस करते हैं तो मानियेगा हमारे भीतर मृदुता-कोमलता आनी शुरू हो गयी है। तृप्ति मान-सम्मान से भी नहीं

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मंगल आशीष

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