Category: वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
वर्तमान
भविष्य वर्तमान का ही तो Extension है। वर्तमान अच्छा तो, भविष्य अच्छा होगा ही। * गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी * (भूतकाल के दोषों को
व्यक्त्ति
साधना की पृष्ठभूमि…….विरक्त्ति, आराधना की पृष्ठभूमि…अनुरक्त्ति, शब्द अपने आप में…अभिव्यक्त्ति, मौन…………………… व्यक्त्ति है। गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
शोर
बनता* चुपचाप है, टूटता आवाज़ के साथ है। इस संसार में आवाज़ ही आवाज़ है। गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी * निर्माण।
नियम
नियम बने हैं, ताकि हम बने रहें। होता यह है कि नियम बने रहते हैं, हम टूट जाते हैं। गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
बाह्य/अन्तरंग योग
अच्छे कर्म यदि बुरे भाव से किये जायें तो परिणाम शून्य। बुरे कर्म अच्छे भाव से, तो भी शून्य। गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
शरीर / आत्मा
शरीर देवालय है, आत्मा देव। देव की पूजा/ साधना के लिये देवालय होता है। पर प्रीति तो देव से ही, देवालय से न प्रीति ना
सल्लेखना
सल्लेखना के आखिरी 4 साल में शरीर को कष्ट सहिष्णु बनाना होता है, इससे सहन शक्ति बढ़ती है/ शरीर आरामतलब नहीं बनता है। फिर रसों
साधु बनने का उपदेश
पहले साधु बनने का उपदेश क्यों दिया जाता है ? पहले मंहगा/ कीमती माल ग्राहक को दिखाया जाता है, यदि चल गया तो बड़ा फायदा
बुरा
बुराई करने वाला बुरा नहीं होता है, (वो तो बस) बुराई करने से बुरा हो जाता(सिर्फ बुराई करते समय)। गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
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