Category: वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर

पुरुषार्थ और संगति

दीपक दो प्रकार से जलाया जा सकता है – 1. माचिस पर तीली रगड़ करके – पुरुषार्थ 2. जलते हुए दीपक के सामीप्य से –

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परमात्मा

परमात्मा एक अवस्था है जो व्यवस्था नहीं करती बल्कि जिसके माध्यम से हम व्यवस्थित हो जाते हैं । परमात्म अवस्था किसी भी जीव को प्राप्त

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कषाय

एक रेत का कण, खीर का आनंद समाप्त, एक छोटी सी दुर्गंध पूरे वातावरण को दूषित, नीम का बीज भी कड़ुवा होता है । कषाय

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बारह भावना

बारह भावना में मोक्ष क्यों नहीं ? समिति, गुप्ति आदि धार्मिक क्रियाओं से संवर; तपादि से निर्जरा और इनकी पूर्णता का नाम ही तो मोक्ष

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झुकना

अगरबत्ती को भी (जलने) सुगंध बिखेरने के लिये झुकना पड़ता है । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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साधना

साध (इच्छा) + ना । पारस बनने के लिये, पारस पत्थर की इच्छा का त्याग करना होगा । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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भक्ति

भक्ति हमें आलसी या अहंकारी नहीं बनाती, बल्कि सच्चा पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देती है । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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प्रदर्शन

आओ देखो, जो तुम्हारे पास नहीं है, मेरे पास है । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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एकत्व

हम किसी के साथ रहते हैं/चलते हैं, यह संयोग है । वह हमें सहयोग देता है तो उसे हम साथी कहते हैं । पर क्या

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रागद्वेष और विरक्ति

आपको किन्ही दो के बीच में राग दिख रहा है तो मानना आपको द्वेष है, और यदि द्वेष दिख रहा है तो आपका राग छिपा

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मंगल आशीष

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