Category: अगला-कदम

भावलिंगी

छठे गुणस्थान और ऊपर वाले भावलिंगी मुनि ही होते हैं । अनुत्तर और अनुदिश स्वर्गों में भावलिंगी मुनि ही जाते हैं । जिज्ञासा समाधान पेज

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देवायु बंध

सम्यग्दर्शन के साथ अणुव्रत और महाव्रत, मिथ्यादर्शन के साथ बालतप – अकाम निर्जरा, समीचीन धर्म श्रवण, आयतन सेवा तथा सराग संयम से । कर्मकांड़ गाथा

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मनुष्यायु बंध

मंद कषायी यानि मृदु भाषी, असंयम, मध्यम गुणों, मरण समय पर संक्लेश रहित परिणामों से । कर्मकांड़ गाथा : – 806

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तिर्यंचायु बंध

विपरीत मार्ग उपदेश, मायाचारी, 3 शल्य ( मिथ्यात्व, माया और निदान ), मरण समय आर्तध्यान से । कर्मकांड़ गाथा : – 805

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नरकायु बंध

मिथ्यादर्शन, बहुत आरंभ, अपरिमित परिग्रह, कुशील, तीव्र लोभ, रौद्र परिणाम और पाप करने में बुद्धि रखने से बंधती है । कर्मकांड़ गाथा : – 804

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चारित्र मोहनीय बंध

तीव्र कषाय और नो कषाय, अधिक मोह, रागद्वेष में अति लीनता से तीव्र अनुभाग का बंध होगा । तीव्र कषाय – तपस्वियों के चारित्र में

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वेदनीय कर्म बंध के कारण

साता का बंध – दया, व्रत ( हिंसादि त्याग), योग ( समाधि परिणाम ), धर्म-ध्यान, शुक्ल-ध्यान, क्षमा, दान ( आहार, औषधि, अभय, ज्ञान ) पंचपरमेष्ठी

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तीर्थंकर प्रकृति

3 अशुभ लेश्याओं में तीर्थंकर प्रकृति का प्रारंभ नहीं होता । लेकिन नरक आयु पहले से बंधे होने पर, तीसरे नरक तक कपोत लेश्या में

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उद्वेलना

रस्सी को बटा, फ़िर खोल दिया । अपकर्षण करके अन्य प्रकृति रूप प्राप्त करा कर नाश करना । कर्मकांड़ गाथा : – 349

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मंगल आशीष

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