Category: डायरी

साधु-चर्या

साधु-चर्या नित्य एक सी होते हुए भी उबाऊ नहीं, क्योंकि अनुभूति नित्य नयी होती है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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सकारात्मकता

जिस क्रिया से सुख मिले उनसे सकारात्मकता आती है पर सिर्फ अपने को सुख देने वाली से नहीं, पर को भी सुख मिले उससे आती

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शिष्य

सच्चा शिष्य वह, जो गुरु का मुख नहीं, पीठ चाहे; गुरु प्रतिकूल हों, पर शिष्य अनुकूल रहे/उसका अनुसरण करे, बिना गुरु की कृपादृष्टि पाये भी

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मंत्र / तंत्र / यंत्र

पहले मंत्रों को सिद्ध करके काम करवाते थे, फिर तंत्र विद्या आयी ; ये दोनों भावनात्मक थे । अब यंत्र की बहुलता है जैसे क्रेन

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आकांक्षा

आकांक्षा बुरी नहीं है, दुराकांक्षा और अतिमहत्वाकांक्षा से बचें ।

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मंगल आशीष

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October 19, 2018

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