Category: डायरी

निष्ठा/प्रतिष्ठा

निष्ठा से प्रतिष्ठा मिलती है, पर प्रतिष्ठा के लिये की गई निष्ठा से, प्रतिष्ठा नहीं मिलती ।

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छोटा-बड़ा

दादा बच्चे को खिलाते हैं, बच्चा बड़ा होकर दादा जी को । फिर बड़ा कौन ? छोटा कौन ??

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मूल्य

बंदर के हाथ हीरा पड़ गया, खाकर देखा, फेंक दिया । हीरा रो पड़ा !! गुरु – मूल्य तभी है जब उसका ज्ञान हो तथा

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समानुभूति

दूसरे की पीड़ा ख़ुद में महसूस करना । तड़पता देखता हूँ कोई शय (जीव), उठा लेता हूँ, अपना दिल समझकर ।

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कर्म

कर्म बछड़े जैसे हैं, जो 100 गायों में छिपी अपनी माँ को ढ़ूँढ़ ही लेता है ।

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जीवन

जीवन एक “गणित” है। साँसें “घटती” हैं, अनुभव “जुड़ते” हैं । अलग अलग “कोष्ठकों*” में बंद हम बुनते रहते हैं “समीकरण**”, लगाते रहते हैं “गुणा-भाग”।

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डर

एक “माटी” का “दिया” सारी रात अंधियारे से लड़ता है.. तू तो “भगवान” का “दिया” (हुआ) है, तू किस बात से डरता है ! (सुरेश)

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धर्म ध्यान

धर्म ध्यान से अभाव मिटे ना मिटे, पर स्वभाव परिवर्तित होने से समभाव ज़रूर आता है ।

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मंगल आशीष

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