Category: वचनामृत – अन्य
नकल
किसी की नकल करना आत्महत्या है।अपनी आत्मा की हत्या ही तो है! हर व्यक्ति के अपने-अपने मौलिक गुण होते हैं,उनकी हत्या ही तो होगी! मुनि
उत्साह
उदासीनता से न तो संसार चलता है, न ही परमार्थ। जब इनमें उत्साह रहता है, तब दोनों उत्सव बन जाते हैं। मुनि श्री सौरभसागर जी
पापी भी सुखी ?
साइकिल पैडल मारने पर चलती है। लेकिन ढलान पर बिना पैडल मारे भी! क्योंकि पहले काफी पैडल मारकर अच्छी गति प्राप्त कर ली थी। ढलान
फटना
दूध जितना फटता है (दूध से दही, मक्खन, घी आदि) उतनी कीमत बढ़ती है। हम जितना फटते हैं उतनी कीमत घटती है। मुनि श्री विनम्रसागर
पाप
पाँच प्रकार के पापों का फल उत्तरोत्तर अधिक-अधिक है- हिंसा से ज्यादा झूठ का क्योंकि इसमें हिंसा भी आ जाती है। ऐसे ही चोरी, कुशील,
विचार
विचार कर्मों पर आधारित या पुरुषार्थ पर ? दोनों के संयोग से। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 23)
ब्रह्मचर्य
संसार रूपी भ्रम को पहचान कर ब्रह्म को चरना/ आचरण करना ब्रह्मचर्य है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
परोपकार
एक दीपक दूसरे को प्रकाशित करते समय अपनी बाती/ घी/ प्रकाश नहीं देता फ़िर भी दूसरा प्रकाशित हो जाता है/ उसके जीवन से अंधकार समाप्त
रावण
क्या रावण को धर्मात्मा कहें क्योंकि वह विद्वान के साथ-साथ पूजा/पाठ भी बहुत करता था ? लेकिन उसका उपयोग सीता जी में था इसलिए वह
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