Category: अगला-कदम

कर्मबंध

कुछ कर्म 7वें गुणस्थान में ही बंधते हैं जैसे अहारक-द्विक (शरीर+अंगोपांग), इनका उदय 6 गुणस्थान में । इन कर्मों के बंध का कारण भी राग (संयम अवस्था

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उदीरणा

किसी भी कर्म के अनुभाग, प्रकृति, प्रदेश तथा स्थिति की उदीरणा साथ साथ होती है । मुनि श्री सुधासागर जी

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वेदनीय की स्थिति

असाता की उत्कृष्ट स्थिति 30 कोडाकोडी सागर, साता की 15 । पर असाता के संक्रमण की अपेक्षा, साता की 30 कोडाकोडी सागर भी हो सकती

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केवलज्ञान

केवलज्ञान आत्मा की पर्याय नहीं है, ज्ञानगुण की पर्याय है । मुनि श्री सुधासागर जी

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क्षयोपशम सम्यग्दर्शन की स्थिति

क्षयोपशम सम्यग्दर्शन की उत्कृष्ट स्थिति 66 सागर से कुछ कम, क्योंकि आखिरी अंतर्मुहुर्त में या तो क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त करें अथवा पहले या दूसरे या

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आकिंचन्य

व्यवहार आकिंचन्य – अपने पास किंचित रखना (ताकि जीवन चल सके ) निश्चय आकिंचन्य – किंचित भी मेरा नहीं है । चिंतन

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पुद्गल का वर्ण

पुद्गल की स्वाभाविक परिणति (वर्ण) अंधकार है, प्रकाश तो नैमित्तिक है । मुनि श्री सुधासागर जी

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स्त्री-मुक्ति

स्त्री-मुक्ति का निषेध नहीं कहा बल्कि सावरण लिंग का निषेध है । पुरुष को भी सावरण लिंग सहित मुक्ति नहीं । जो हुआ नहीं/हो नहीं

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विग्रहगति

विग्रहगति में पर्याप्तक तथा अपर्याप्तक नामकर्म वाले जीवों के इन कर्मों का उदय नहीं होता है । जन्मस्थान पर पहुँच कर यथायोग्य नामकर्म का उदय

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परमाणु से स्कंध

1. परमाणुओं में बंध, उनमें स्निग्ध या रुक्ष गुणों के कारण होता है । 2. परमाणुओं के शक्त्यांशों में – I. 2 का अंतर होना

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मंगल आशीष

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