Category: अगला-कदम

तैजस/आहारक

इन शरीरों के निकलते समय औदारिक वर्गणाओं का अनुदय और अनुबंध रहता है । इस समय तैजस/आहारक वर्गणाओं का कार्मण वर्गणाओं से ही संबंध होता

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विग्रह गति में पर्याप्तियाँ

विग्रह गति में सब जीवों को अपर्याप्तक ही माना जाता है क्योंकि पर्याप्तक/अपर्याप्तक के अलावा किसी भी जीव की तीसरी अवस्था नहीं होती है ।

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क्षपक सम्यकचारित्र

क्षपक श्रेणी में 8 से 10 गुणस्थान में उपचार से क्षायिक सम्यकचारित्र ही मानना होगा क्योंकि उपशम, क्षयोपशमिक सम्यग्दर्शन तो हो नहीं सकते । 12

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कषाय

कर्मबंध में बड़े कारण मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद होते हैं तो कषाय को इतना बुरा क्यों माना जाता है ? पहले तीन कठिन हैं, कषाय पर

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निद्रा

3 तीव्र निद्राओं के उदय में सम्यग्दर्शन प्रारम्भ नहीं होता । ( पर सत्ता में 9 गुणस्थान तक तथा उदय 6 गुणस्थान तक) पर निद्रा और प्रचला

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धर्मध्यान

अपाय विचय “कारण” है, उपाय विचय “करण” है । धर्मध्यान के 4 भेदों में दोनों पर्यायवाची/एक भेद कहे गये हैं, 10 भेदों में अलग अलग

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धर्म/अधर्म की सहकारता

हर प्रदेश पर धर्म और अधर्म विद्यमान हैं, तो जीव/पुदगल चले या रुके ? दोनों ही उदासीन हैं, जीव/पुदगल चलना चाहें तो धर्म द्रव्य सहकारी

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म्लेच्छ खंड़

सम्यग्दर्शन यहाँ नहीं होता (सबका गुणस्थान 1), इसको छोड़कर आर्यखंड़ में आने पर हो सकता है । यहाँ लब्धिपर्याप्तक नहीं होते क्योंकि वातावरण साफ सुथरा

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मंगल आशीष

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