Category: वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
क्रोध
किसी को कुँऐ में गिरता देख, तुम भी कुँऐ में गिरते हो ? यदि नहीं, तो किसी को क्रोध करते देखकर क्रोध क्यों करते हो
कर्म
कर्म उनको पैदा करने वाले से बड़े नहीं होते । जो पैदा करना जानता है वह उन्हें समाप्त भी कर सकता है । गुरुवर मुनि
संसार भ्रमण
जो बच्चे कक्षा में बार बार फेल होते हैं, उन्हें उसी कक्षा में बार बार रहना परता है । यदि हम कर्मोदय में बार बार
सुख
थोड़े से, क्षणिक सांसारिक सुख के बदले में अनंत/शास्वत आत्मिक सुख को छोड़े/भूले हुये हैं । ऐसा ही है जैसे मंज़िल के रास्ते में थोड़ी
रुकना
रुकते तो मेले में हैं, संसार के मेले में गति कहाँ ? इसीलिये कहा है – रुकना मृत्यु है, मुक्ति से दूर होना है ।
मंदिर
मंदिर में आने का मतलब- उतनी देर के लिये संसार से दूर/संसार छूटना । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
विसर्जन
जब ग्रहण अनासत्ति भाव से होगा, तभी छोड़ पाओगे । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी (आत्मान्वेषी)
दान/परोपकार
हमारा तो बस वह है जो हम किसी को देते हैं, जैसे दान/परोपकार । किसी से छीना हुआ हमारा कैसे हो सकता है ? गुरू
उत्तम त्याग धर्म
आप आम को खाने से पहले उसे दबा दबा कर ढ़ीला करते हैं, फिर उसके ऊपर से टोपी (ड़ंठल) हटाते हैं, खाने से पहले चैंप
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