Category: वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर

उत्तम क्षमा

जो जितना सामर्थ्यवान होगा वह उतना क्षमावान भी होगा। जो जितना क्रोध करेगा वह उतना ही कमजोर होगा। कागज़ की किश्ती कुछ देर लहरों से

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द्रढ़ता

एक ग़रीब बुढ़िया मंदिर बनवाना चाहती थीं। पैसे कितने हैं ? 2 रुपये । इसमें मंदिर कैसे बनेगा ? 2 रुपयों के साथ 2 चीज़ें

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वैराग्य

दु:ख से ऊबकर लिया गया वैराग्य टिकता नहीं। (क्योंकि पुण्य आकर्षित करता रहता है-गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी) टिकाऊ वैराग्य लेना है/प्रगति करनी है तो

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समर्पण

समर्पण यानि अपने को आराध्य के लिये मिटा देना। मिटाना यानि अपने मन को आराध्य के अनुसार चलाना। गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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फल

सारी घटनायें हमेशा पूर्व कर्मों का फल ही नहीं होतीं, संयोगाधीन भी होती हैं । सारे बैंक ट्रांजैक्शन पूर्व जमापूंजी के अनुसार ही नहीं होते

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तपादि के कष्ट

तपादि के कष्ट वैसे ही हैं जैसे फोड़े को ठीक करने के लिये डाक्टर फोड़े को फोड़ता है/कष्ट होता है । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर

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विकास

बाह्य विकास करने की मनाही नहीं है, पर उसे Ultimate मत मानो । आंतरिक विकास बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी है । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर

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मंगल आशीष

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