धन से नहीं, मन से अमीर बनें,
क्योंकि
मंदिरों में स्वर्ण कलश भले ही लगे हों लेकिन नतमस्तक पत्थर की सीढ़ियों पर ही होना पड़ता है।

(सुरेश)

(महत्व मूल्य का नहीं, उपयोगिता का है >>> सीढ़ियाँ ऊपर उठाती हैं/ भगवान के पास ले जाती हैं)

घर में पेंट करते समय कारीगर ने रंग दिखा कर सहमति चाही।
बुढ़ापे में वैसे तो नज़र भी कमज़ोर हो जाती है;
दूसरा – अच्छे बुज़ुर्गों को सब अच्छा लगता है, बुरों को सब बुरा।

चिंतन

दर्पण को ना*,
दर्पण में देखो ना**,
निर्दोष होने।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* बाह्य/ Frame/ दर्पण की Quality.
** दर्पण में अपने दोषों को देखो।

मान को प्राय: हम बो* देते हैं, फिर मान की फसल लहराने लगती है।
साधुजन उसे बौना कर देते हैं तब वह न वर्तमान में न भविष्य में पीड़ा देता है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

* संरक्षण

कंकड़ को आँख के बहुत करीब ले आओ तो पहाड़ सा दिखेगा।पहाड़ को दूर से देखो तो कंकड़।

समस्याओं के साथ भी ऐसा ही होता है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

सम्बंधियों को याद करोगे तो दु:ख होगा/ कर्मबंध होगा। यह कहना कि उनके गुणों को/ उपकारों को याद करते हैं, यह भी पूर्ण सत्य नहीं, याद तो मोहवश ही किया जाता है।
बचें कैसे ?
सच्चे गुरु/ भगवान को याद करें, उनमें गुण भी बहुत और उनके उपकार भी ज्यादा तथा कर्मबंध की जगह कर्म कटते हैं।

चिंतन

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