सम्बंध कांच जैसे होना चाहिये –
1. सावधानी जैसे कांच के बर्तनों के साथ रखते हैं
2. पारदर्शिता
3. टूटने पर ताप देकर नया बनाया जा सकता है; सम्बंधों को क्षमा/प्रायश्चित के ताप से नया बनाया जा सकता है।
अमरकंटक प्रवास के दौरान एक युवक भारी घाटा होने से आत्मघात करने जा रहा था।
उसे आचार्य श्री विद्यासागर जी से संबोधन दिलवाया –
आचार्य श्री – “दान करो”
उसकी जेब में 500रुपये थे, उसने पूरे दान कर दिये।
समाज वालों ने नौकरी दी, Partner बनाया।
एक-डेढ़ साल में सब Loan उतर गया, वरना धर्म परिवर्तन के प्रलोभन तक में आ चुका था।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अच्छाई मोह से बड़ी होती है।
आपके दो बच्चे हों, दोनों से मोह होगा।
यदि एक में अच्छाईयाँ हैं तो मोह बढ़ेगा, दूसरे में नहीं हैं तो कम या समाप्त हो जायेगा।
चिंतन
प्राय: पूरा आनंद/सुंदरता लेने/देखने के लिये 14 दिन पूर्णमासी का इंतज़ार करते रहते हैं।
चंद्रमा की हर कला/आकृति की सुंदरता का नित्य 15 दिन आनंद क्यों नहीं लेते ?
चिंतन
सत्य शब्द तो सत् से बना है तो वह कड़वा कैसे हो सकता है !
(कमलकांत)
कान का कच्चा कहावत कैसे बनी ?
वह कान का कच्चा जो यह कहने पर कि तेरा कान कौवा ले गया, वह कौवे को पहकड़ने दौड़ पड़े ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
मन की निर्मलता अनेकांत से,
वचन की निर्मलता स्याद्वाद से,
काय की निर्मलता अहिंसा से आती है।
(कमलकांत)
शब्दों की कीमत नहीं होती,
पर उनके सही/ग़लत प्रयोग से आपकी कीमत बढ़/घट जाती है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
ईसबगोल को गर्म पानी से लो तो कब्ज़ दूर, ठंडे से लो तो दस्त बंद।
सादा पानी से लो तो ?
पेट में जाकर प्रश्नचिन्ह ? न कब्ज़ ठीक ना ही दस्त!
इसे कहते हैं अनुभय स्थिति, न सत्य न झूठ/ न पुण्य न पाप।
चिंतन
आहार लिये बिना, आत्मा में विहार हो नहीं सकता।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
बुरे लोगों की बुराई का क्या बुरा मानना !
तपती सड़क पर एक बच्चा नंगे पैर चने बेच रहा था। एक व्यक्ति को दया आयी उसने चप्पल दिलवा दी।
आंसू भरी आंखों से बच्चे ने पूछा – क्या आप भगवान हैं ?
नहीं।
तो भगवान के दोस्त हो ?
ऐसा क्यों पूछ रहे हो ?
कल ही तो मैंने भगवान से चप्पल के लिये प्रार्थना की थी।
व्यक्ति सोचने लगा – भगवान तो बन नहीं सकता, भगवान का दोस्त बनना आसान है, सस्ता भी।
(अरुणा)
ऊब से बचने के उपाय….
1. रुचि पैदा करें
2. स्वीकारें
3. संकल्प पूरा करें
4. लक्ष्य के प्रति आदर भाव रखें
ऊबना है तो पाप से ऊबो, धर्म में डूबो।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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