मौलिकता का मतलब परम्पराओं को तोड़ना नहीं, केवल लीक से हटकर आगे बढ़ना, अच्छे को अपनाना, बाकी से सुरक्षित दूरी रखना है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

फल एक बार ही स्वाद (खट्टा या मीठा) देता है,
कर्म भी एक बार फल देकर झर जाते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

तपादि के कष्ट वैसे ही हैं जैसे फोड़े को ठीक करने के लिये डाक्टर फोड़े को फोड़ता है/कष्ट होता है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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