दर्पण साबुत होता है तब सब उसे देख-देख कर चलते हैं,
टूट जाता है तो उससे ही बच-बच कर चलते हैं ।

दर्पण यदि आचरण के फ्रेम में जड़ जाय तो टूटने का डर ही नहीं रहेगा ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी


एकमात्र पक्षी जो बाज को चोंच मारने की हिम्मत करता है,
वह है रेवेन…
यह बाज की पीठ पर बैठता है और उसकी गर्दन पर अपनी चोंच से काटता है, पर बाज जवाब नहीं देता, न रैवेन से लड़ता है-
बाज रेवेन के साथ लड़ने में समय और ऊर्जा बर्बाद करना व्यर्थ मानता है – बाज सिर्फ अपने पंख खोलता है और आसमान में और ऊँची उड़ान भरने लगता है – उड़ान जितनी ऊँची होती जाती है,रेवेन को सांस लेने के लिए उतनी ही कठिनाई होती है,
और अंत में ऑक्सीजन की कमी के कारण रैवेन गिर कर मर जाता है – इसीलिए कभी कभी सभी लड़ाइयों का जवाब देने की आवश्यकता नहीं होती है, लोगों के तर्कों कुतर्कों या उनकी आलोचनाओं के जवाब देने की कोई आवश्यकता नहीं है बस अपना कद ऊपर उठायें,
वह स्वतः ही गिर जाएंगे……………….

(अरविंद)

एक बार बादलों ने हड़ताल कर दी ।
किसानों ने अपने अपने हल Pack कर दिये ।
एक किसान खेत जोतता रहा ।
बादलों ने पूछा – जब बरसात होनी ही नहीं है तो हल क्यों चला रहे हो ?
किसान – ताकि आदत बनी रहे ।
बादलों को भी चिंता हुई – कहीं हम बरसना न भूल जाय और वे बरस पड़़े ।
जिन्होंने हल Pack कर दिये थे, वे हाथ मलते रह गये ।

(डॉ. मनीष)

कर्म काटने का सरलतम उपाय – पापोदय के समय अपने कुकृतों को स्वीकारो/ प्रायश्चित लो/ आगे  पुनरावृत्ति न करने का संकल्प लो ।
देखा भी गया है – जब अपराधी अपनी ग़लती स्वीकार कर लेता है तब सज़ा देने वाला Mild हो जाता है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

अपने आप को 3 प्रकार से पहचाना जा सकता है ।
1. परछायीं देखकर, पर इसमें नाक/कान आदि नहीं दिखते जैसे परदेश की सीमा पर खड़े होकर उस देश को देखते हैं ।
ऐसे ही प्राय: हम धर्म करते हैं -बिना  चिंतन; मंथन के बिना नवनीत नहीं मिलता/देखा देखी (देखा + अदेखा) ।
2. प्रतिबिम्ब देखकर – विस्तृत दिखायी देते हैं । अपने को पहचान सकते हैं ।
3. ध्यान से – इससे अंतरंग का भी दर्शन होता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

भोगों के पीछे का अभिप्राय यदि दूषित है, तो वह दुर्गति में ले जाता है,
जैसे पुराने ऋषि(सनातन धर्म के) आश्रमों में पत्नियों के साथ रहते थे, तथा चक्रवर्ती राजाओं को बहुत सी लड़कियाँ दी जाती थीं पर वे उनका पत्नी के रूप में चयन नहीं करते थे, ना ही Rejection.

मुनि श्री अविचलसागर जी

वृद्धावस्था में मकान बेचकर उसी में किरायेदार बन कर रहें, इस commitment के साथ कि जब खाली करने को कहा जायेगा तब खाली कर दूंगा ।
जिस शरीर रूपी मकान को हम अपना मानते आ रहे थे अब उसी में किरायेदार की तरह रहो और मृत्यु का आवाहन आते ही आराम से शरीर छोड़ने को तैयार रहो ।

चिंतन

एक बार बिलग्रेट्स से पूछा – क्या आपसे भी ज्यादा धनवान कोई है ?
बिलगेट्स – हाँ, एक अखबार बेचने वाला मुझसे भी ज्यादा धनवान है ।
कैसे ?
शुरु शुरु में एक बार अखबार खरीदने के लिए मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे ।
उसने दोनों बार मुझे मुफ्त में अखबार दे दिया था ।
अब मैं उसे कुछ भी देने गया तो उसका ज़बाब था – आपकी सहायता मेरी सहायता की बराबरी नहीं कर सकती है । मैैंने गरीबी में सहायता की थी, आप अमीरी में करना चाहते हो ।

Moral – सहायता के लिये धनवान होने का इंतज़ार मत करो

(शशी)

सेठ की कोठी के पास ही गरीब की झोंपडी थी ।
गरीब लडके की माँ मरी तो उसके लड़के ने अपने शब्दों में दुःख ज़ाहिर किया कि… तूने पिता के मरने के बाद दूसरों के घरों में झाड़ू पोंछा करके मुझे पाला आदि, अब जब मेरा करने का समय आया, तू चली गयी…।
लोगों ने उसकी भावनाओं की बहुत तारीफ़ की ।
सेठानी के मरने पर उस सेठ के लडके ने भी अपनी तारीफ़ कराने के लिये गरीब लड़के वाले शब्द ही दोहरा दिये… !

हम भी तो  भगवान की स्तुति दूसरों के शब्दों में ही करते हैं,
चाहे स्तुति रचयिता के हालात हमारे लिये उपयुक्त हों या न हों ।

मुनि श्री अविचलसागर जी

सिनेमा देखते हुये एक व्यक्ति मूंगफली खा खा कर छिलके बगल वाले की जेब में डालता जा रहा था ।
दूसरी तरफ बैठे मित्र ने कहा – उसे पता लगते ही, तू पिटेगा !
तुझे पता लगा क्या ?
(वह मित्र की जेब छिलकों से पहले ही भर चुका था)

विषय-भोगों में ऐसी ही तल्लीनता रहती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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