अहंकार…
राजा भोज के दरबार में एक ज्ञानी ने कोरे कागज पर बिना कुछ लिखे बताया कि इस कागज पर एक सुंदर कविता लिखी है।
पर दिखेगी उसी को जो पवित्र होगा।
सबने कहा बहुत सुन्दर-बहुत सुन्दर।
क्षु. सहजानंद जी
पौधे कम खाद देने पर कम मरते हैं, ज्यादा खाद देने पर ज्यादा।
शरीर/ संसार के लिये Excess ज्यादा हानिकारक है।
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
वृद्ध काँच के जार में रखी गोल्ड फ़िश जैसे होते हैं।
हर एक की निगाह उन पर होती है। इसलिये उनको अपने आचरण के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिये।
कमलकांत
अपराध करना अधर्म।
उसका फल सहजता/ स्वीकृति के साथ सहना, धर्म।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
साधु का घर दूर है जैसे पेड़ खजूर,
चढ़े तो मीठे फल चखे, गिरे तो चकनाचूर।
मुनि श्री अजितसागर जी
तप/ ताप (गर्मी) से हम बहुत घबराते हैं। जबकि ताप के बिना न अनाज आदि पैदा होगा, ना ही उसे पचा (जठराग्नि) पायेंगे।
आचार्य श्री विद्यासागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी
याचना –> शब्द ज्यादा, भाव कम।
प्रार्थना –> शब्द कम, भाव ज्यादा।
(धनजी भाई – भोपाल)
वर्तमान के क्रियाकलाप मेरे व्यक्त्तित्व का सही से निर्धारण नहीं कर सकते।
मैं क्या नहीं कर पा रहा हूँ, वह सही निर्धारण करेगा।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
त्याग से ही व्यक्ति बड़ा/ महान बनता है, भोग से नहीं (नीचे ही जाता है)।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
व्यक्तियों से जुड़ोगे तो मोह।
गुणों से जुड़ोगे तो धर्म।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जब आत्मा और परमात्मा दोनों अंदर ही हैं तो उनके मिलने का रास्ता भी तो अंदर ही होगा न !
(मंजू रानीवाल)
हम शरीर से ही पूरे जिंदा दिखते हैं।
मन से आधे (क्योंकि कोई भी हमारा मन तोड़ जाता है)।
आत्मा से तो हम पूरे ही मरे हुए हैं।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
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