एक बहन धार्मिक क्रिया के लिए छोटी सी मटकी को नल के नीचे लगाकर नल पूरा खोल देती थीं (ताकि जल्दी भर जाए, पर आधी अधूरी ही भरती थी)। एक दिन दूसरा काम कर रही थी, नल को थोड़ा सा खोला। देखा! मटकी ऊपर तक भर गई थी।

एकता – पुणे

सीख –> उतावली की तो आधे अधूरे रह जाओगे। सब्र का फल पूरा/ मीठा होता है।

चिंतन

भगवान की मूर्ति…. “निरखों अंग-अंग जिनवर के, इनमें झलके शांति अपार।”
अलग-अलग अंगों का अपना-अपना प्रभाव होता है, उनसे अलग-अलग एनर्जी मिलती है।
अलग-अलग समय पर दर्शनों का भी प्रभाव अलग-अलग होता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आत्मा का चिंतन/ परिचय कैसे करें ?
आत्मा के गुणों (श्रद्धा/ ज्ञान/ दयादि) का चिंतन करने तथा इन गुणों को जीवन में उतारने से परिचय होगा।

क्षु. श्री सहजानंद वर्णी जी

करवट चाहे रात में बदलें या दिन में, Left को लें चाहे Right को, सावधान रहते हैं (ताकि गिर ना जायं)।
जब समय बदले (अच्छा या बुरा), सावधान रहें (ताकि गिर ना जायं) !

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पेड़ के पत्ते सड़/ सूख/ पीले हो रहे हैं, सब चिंतित हैं।
उसे किस जमीन में रोपा, कैसा खाद, सडा़ पानी दिया/ दे रहे हैं, विचार किया !
उनको धर्म/ गुरु से जोड़ा ? या पैसा/ नाम से/ आधुनिक जीवन से ही ??

चिंतन

उपदेश पात्र तथा कुपात्र को भी, जैसे हो उसे ही व्यवस्थित करने।
ज्ञान पात्र को ही जैसा गुरु चाहते हैं, वैसा बनाने को।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

सुपात्र (साधु) को दान देने का एक और फायदा -> सुपात्र को इच्छा/ अपेक्षा नहीं, ऐसों को दान देने से हमारी अपेक्षा/ इच्छा कम होगी।
ऐसे सुपात्र वायदे नहीं करते, इन्हीं के आशीर्वाद फलते हैं जैसे फलदार पेड़।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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