कांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्त्तव्य पर कम हो जाती है।
इससे विशुद्धि/ शांति भी कम हो जाती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 7/23)

रुलाना….
किसी को रुलाने का पाकीज़ा तरीका… हँसाओ इस क़दर कि पानी निकल आये,
हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सज़ा देते हैं।
हाथ उठाते नहीं, नज़रों से गिरा देते हैं।

डॉ. ब्र. नीलेश भैया

मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं।
दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या?

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

सिद्धि के लिये साधना होती है।
लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिये होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती है

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नया व्यक्ति गाँव में पहुँचा।
पूछा –> यहाँ के लोग कैसे हैं ?
मैं ही ईमानदार हूँ (पूरे गाँव के बारे में कथन हो गया)।
दूसरे से पूछा –>
मैं भी ईमानदार हूँ (इसमें भी पूरा कथन हो गया)।

पहले वक्तव्य में घमण्ड, दूसरे में विनम्रता। फ़र्क सिर्फ “ही” और “भी” का है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ/ दिमाग शिथिल हो जाते हैं। जिन चीज़ों में पहले से रुचि है वही आगे बढ़ जातीं हैं।
यदि खाने में तो खाते रहते, पूजा-पाठ तो वह बढ़ जाता है।
इसलिये शुरु से ही संस्कार अच्छे/ धार्मिक डालें।

चिंतन

अकेला कोई रहना नहीं चाहता।
दो होते ही… तीन…चार।
तालाब में पत्थर फैंकते ही एक, फिर अनेक लहरें उठ जाती हैं।
ऐसे ही विचार एक के बाद अनेक आने लग जाते हैं।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

माली राजा को रोज़ाना फल लाकर देता था।
राजा एक खाता/ रखता, दूसरा माली के ऊपर फेंकता।
माली कहता “अच्छा हुआ”।
पूछा, ऐसा क्यों कहता है ?
अच्छा हुआ मैं तरबूज नहीं लाता।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

मोटे पेट वाला व्यक्ति गोल्फ़ खेलने गया।
बॉल पास में रखी तो दिखी नहीं, दूर रखी तो वहाँ स्टिक पहुँचे नहीं।
हमारी भी दूर/ दूसरों की चीज़ों पर दृष्टि जाती है पर पहुँच नहीं।
पास/ अपने पास की चीज़ों पर दृष्टि पहुँचती नहीं। (क्योंकि पेट बड़ा है/ संचय ज्यादा है, सदुपयोग कम)

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा….
आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ?
सूखे पत्ते सा।
वो कैसे ?
सुखे पत्ते की अपनी कोई इच्छा/ मंज़िल नहीं होती,
गुरु रूपी हवा जिधर ले जाती है, उधर चला जाता है।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

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