जिसको विकल्पों में रस नहीं, उसे रसों का विकल्प नहीं।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

मज़ा… संसार पर आश्रित। अल्प समय का।
*आनंद.. गुरु/ भगवान के निमित्त/ निकटता/ उनकी सेवा करने से।

 

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/24)

*(लंबे समय का या Permanent।)

इष्ट के साथ अनिष्ट भी जुड़ा रहता है जैसे प्रवचन इष्ट, इसमें अवरोध अनिष्ट।
बचपन में माँ इष्ट, बड़े होकर माँ अनिष्ट।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

क्या पैसा पुण्य से आता है ?
नहीं, यदि पुण्य से आता होता तो साधु को पुण्यहीन मानना पड़ेगा!
फिर ?
पुण्य की Background में पाप-क्रियाओं से कमाया जाता है।
साधु इस पुण्य को और पुण्य कमाने में लगाकर परमार्थ को बढ़ाते हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

भक्त से भगवान…
भगवान के सामने बोलो/ अनुभव करो… “दासोहम्”।
अगले कदम पर “उदासोहम्” (संसार से)।
अंत में… “सोहम्”।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

सोलर पैनल जैसे होते हैं गुरु। अपनी Energy ख़ुद पैदा करते रहते हैं। फ़र्क यह है कि इनकी Energy रात/ सोते में भी चार्ज होती रहती है तथा शिष्य रूपी ग्रिड को भी Energy देते रहते हैं।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे, “पाप मल है, पुण्य जल है। मल धोने के लिए जल आवश्यक है।”

आचार्य श्री समयसागर जी

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