मायाचारी का उल्टा/ मन वचन काय की एकरूपता आर्जव धर्म है।
एक मासोपवासी(बहुत अंतराल के बाद आहार लेने वाले) मुनिराज तपस्या करके चले गए। उसी स्थान पर एक दूसरे मुनिराज तपस्या करने लगे। लोगों ने समझा वही मासोपवासी मुनिराज हैं और वे जय जयकार करने लगे। दूसरे मुनिराज इस भ्रम को समझ तो गए पर उनके मन में यह भाव आ गया कि मैं थोड़े ही मायाचारी कर रहा हूँ, इन लोगों ने गलत समझा तो मैं क्या करूँ। इस ज़रा से मायाचारी के भाव से उनका दिगंबरत्व दिगंबर(नग्नता) हो गया और अगले जन्म में वह हाथी बने। माया करने से पशु की काया मिली।
सावधान! यदि हम मायाचारी करेंगे तो अगले जन्म में जानवर बनेंगे। जब कर्मों ने बड़े-बड़े मुनिराजों को नहीं छोड़ा, वे हमको क्या छोड़ेंगे!

मुनि श्री सौम्य सागर जी

(धर्म और गुरु की ना मानना, मान है।)
मान का विपरीत,
अपने मान को मान ना देना,
दूसरे के मान से आहत न होना मार्दव धर्म है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी

दसलक्षण धर्म के प्रथम दिवस उत्तम-क्षमा की बधाई,
सबसे क्षमा भाव।
दृष्टि-संयम का पालन करें। लाभ…जीवों की रक्षा, ठोकर न लगना, विकारों का ना आना, आँख की धूल से रक्षा।
अब शेर की दहाड़ हिंसा करने के लिए नहीं, हिंसा करते हुए जीवों को दहलाने के लिए।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (तत्वार्थ सूत्र – 7/14)

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पार्टी आदि में अनर्गल प्रवृत्ति करते समय सुख लगता है, तो ग़लत क्या ?
आपकी प्रवृत्ति से दूसरों को दु:ख/ अशांति, यह ग़लत हुआ/ हिंसा हुई।
ख़ुद की आत्मा का घात होने से अंतरंग हिंसा भी।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्वार्थ सूत्र – 7/14)

10 आमों में एक और मिलाया तो कुल कितने हुए ?
12
कैसे ?
10 + 1 + 1 मेरे पास पहले से था।
हम अपनी-अपनी अपेक्षाओं से निर्णय लेते हैं/ गणित बिठाते हैं, इसलिए हमारा हिसाब गलत हो जाता है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

महावीर मुनि अवस्था में एक गाँव में लंबे समय तक ध्यान तप करते रहे। गाँव वालों ने घास की झोपड़ी बना दी। गाँव वालों ने देखा कि झोपड़ी को जानवर खा गए। महावीर अभी भी ध्यान में है।
गाँव वाले… आपने बचाया क्यों नहीं ?
महावीर… शरीर ही मेरा नहीं, उसकी सुरक्षा का भाव नहीं, तो अन्य की सुरक्षा का भाव कैसे होगा !

ब्र.(डॉ.) निलेश भैया

सब अपनी-अपनी अपेक्षा से पूर्ण हैं जैसे पानी से भरी छोटी तथा बड़ी बाल्टियाँ।
छोटी बाल्टी में पानी और डालो तो पानी Waste ही होगा, पूर्णता बढ़ेगी नहीं, आपका पुरुषार्थ भी निरर्थक होगा।

चिंतन

एक राजा को घोड़ा बहुत प्यारा था। पर उसकी बुरी आदत से राजा को नीचा देखना पड़ता था। चलते-चलते घोड़े को खाने की चीज दिख जाए तो बस उधर ही चल देता था।
पुराने सईस को बुलाया गया, उसने घोड़े को दौड़ाया जैसे ही वह खाने की ओर बढ़ता सईस कोड़ा मारता, दो-चार कोड़े खाकर उसने यह आदत छोड़ दी।

हमारा मन भी घोड़े की तरह है, संसार की ओर भागे तो तगड़े प्रायश्चित का कोड़ा लगा दें, धीरे-धीरे भागना छोड़ देगा।

ब्र. (डॉ.) निलेश भैया

जिस घर में काम कर रहे हो/ रह रहे हो उसे हल्का, दूसरे घर को बेहतर मानें/ कहें तो नुकसान होगा न !
जिस भगवान के आज/ अभी दर्शन कर रहे हो, उसे ही सर्वोत्तम मानो तभी कल्याण होगा।

चिंतन

लघुता क्या है ?
याचना।

प्रश्नोत्तरी रत्नमाला (राजर्षि अमोघवर्ष)

याचना किसे कहें ?
प्रार्थना + स्वार्थ सिद्धि।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

संसारी वस्तुएँ माँगने से संसार बढ़ता है… कमलकांत।
सद्गुण/मोक्षादि माँगने से संसार घटता है। उससे लघुता नहीं आएगी। हालाँकि विशुद्धि बढ़ने से माँगना भी बंद हो जाता है…चिंतन।

श्रद्धा… अज्ञात पर,
भक्ति… ज्ञात पर।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

(गुरु और भगवान तो ज्ञात हैं उन पर श्रद्धा ?
हाँ! ज्यादातर लोगों की ज्यादा श्रद्धा इन पर ही होती है, पर गुरु में अंतरंग गुण क्या हैं वह तो पता नहीं, अज्ञात गुणों पर ही तो श्रद्धा होती है।
पत्थर की मूर्ति पर श्रद्धा नहीं करते हैं, उसमें अज्ञात भगवान पर श्रद्धा करते हैं – चिंतन)।

बच्चों के सुख को प्राथमिकता दें या हित को ?
सुख मन के लिए होता है, हित जीवन के लिए।
सुख को प्राथमिकता दी तो उनका अहित होगा, हित को दी तो सुखी भी रहेंगे।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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