मंदिर/गुरुचरण/अनुकूल परिस्थितियों में सटीक,
गुरुचरण से दूर हुये/विपरीत परिस्थितियों में सोच – सब चलता है ।
तो जीवन सुचारू रूप से कैसे चलेगा !!

जब वर्तमान में निर्वाह आराम से चल रहा है तो कल के निर्वाण की चिंता क्यों करें ?

ताकि कम से कम, कल का निर्वाह भी चल सके,
और भविष्य में कभी निर्वाह की चिंता ना करनी पड़े,
इसी को तो निर्वाण कहते हैं।

चिंतन

कामना उतनी ही करो जितनी औकात हो (पुण्य हों) ।
मज़दूर ने ज़मींदार की शानदार घोड़ी देख, भगवान से ऐसी ही घोड़ी मांगी ।
तभी घोड़ी के घोड़ी पैदा हुई, जमींदार ने घोड़ी की बच्ची मज़दूर के सिर पर रखवाकर मीलों दूर अपने घर ले गया ।

प्राय: धर्मात्मा निर्धन क्यों होते हैं ?

समझदार माँयें बच्चों को उतना ही देती हैं जितने में उनका पालन हो सके, ताकि वे बिगड़ ना जायें ।
पूर्व के पापोदय से धर्मात्मा निर्धन तो हो सकता है, पर दु:खी नहीं ।

श्रावक के धन और तन रूपी दीपक में जब गुरु के मन और वचन रूपी घी और बाती आ जाती है, तब प्रकाश होता है/सामाजिक कार्यों की सिद्धी हो जाती है ।

मुनि श्री समयसागर जी

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April 8, 2022

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