करने योग्य क्रियायें करना ही धर्म नहीं,
उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, अकार्य को ना करना ।
भगवान के भरोसे क्यों बैठे रहते हो !
क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठा हो ।
(प्रांजल)
गुरु-परम्परा के ऊपर आगम-परम्परा होती है ।
आगम-परम्परा में भी, सबसे पुरानी वाली को मान्य मानें ।
मुनि श्री सुधासागर जी
विकारी मृत व्यक्ति को भी सब कंधे पर उठा कर क्यों ले जाते हैं?
क्योंकि मृत्यु के बाद विकार समाप्त हो जाते हैं।

(Divya)
भक्ति का मापदंड़ विरक्ति है ।
सपनों के साथ पुरुषार्थ किया जाये तभी वे लक्ष्य में परिवर्तित हो पाते हैं ।
भोजन ना आत्मा करती है, ना शरीर ।
भोजन तो शरीर और आत्मा के बीच का Agreement है, साथ रहने का ।
जो देश/ समाज/ परिवार/ शरीर की बाधाओं के रहते हुये भी धर्म करने की राह निकाल ही ले ,
कृत से ना कर सके तो कारित या अनुमोदना से करे ।
“पर” के नियंत्रण में Energy Consume होती है,
“स्वयं” के में Preserve ।
माचिस मिलना भाग्य,
उससे आग लगाना या दीप जलाना पुरुषार्थ ।

(P.L.Benara)
साधु-चर्या नित्य एक सी होते हुए भी उबाऊ नहीं,
क्योंकि अनुभूति नित्य नयी होती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जिस क्रिया से सुख मिले उनसे सकारात्मकता आती है पर सिर्फ अपने को सुख देने वाली से नहीं, पर को भी सुख मिले उससे आती है ।
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