भक्ति हमें आलसी या अहंकारी नहीं बनाती, बल्कि सच्चा पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देती है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

एक खेत में देवता रहता था ।
किसान उसमें खेती करने गया तो दोनों में साझेदारी का सौदा हो गया ।
देवता ने नीचे की फसल मांगी तो किसान ने बाजरा बो दिया, देव ने अगली बार ऊपर की मांगी तो किसान ने मूँगफली बो दी ।
देव ने ऊपर तथा नीचे की दोनों में मांगी तो उसने मक्का बो दी ।

इनमें से कौन बड़ा ?

जिन्हें गुरु प्राप्त नहीं होते, उनमें एकलव्य बड़ा,
जिन्हें गुरु प्राप्त होते हैं, उनमें अर्जुन बड़ा ।

मुनि श्री सुधासागर जी

पुण्य की ज़रूरत तब तक, जब तक हमसे पाप हो रहा है । कीचड़ पाप है, इसे साफ करने पुण्य रूपी जल चाहिये,
बिना पानी के शरीर पर कीचड़ सूख जायेगी, चमड़ी उधड़ जायेगी ।
साधु पाप नहीं करते, इसलिये उन्हें पुण्य की आवश्यकता नहीं ।

मुनि श्री सुधासागर जी

भक्तों के द्वारा गुरु की पूजा करते समय गुरु को ध्यान से सुनना चाहिये ताकि अपने आपको उस योग्य बनाये रखने की प्रेरणा मिलती रहे, कमियों को ठीक करने का निमित्त मिलता रहे ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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