मंदिर का शिखर आप लोगों के घर से ऊँचा होना चाहिये ,
वरना धन बढ़ेगा, धर्म कम होगा ।

मुनि श्री सुधासागर जी

भरत को सब ओर से दबाब ड़ाला गया कि वे अयोध्या की गद्दी पर बैठें – माँ, गुरू, राम सबने ।
भरत – मेरे भाग्य में गद्दी होती तो मैं बड़ा पुत्र क्यों नहीं होता !

मुनि श्री सुधासागर जी

1. हमारे पास सुख की कमी नहीं, पर हमें उसकी सुध नहीं ।
2. अज्ञानी पुण्य के उदय को सुख मानता है, ज्ञानी ज्ञान के उदय को ।
3. सुख का कारण पुण्योदय नहीं, पुण्योदय में अपनापन है ।

(धर्मेंद्र)

सांसारिक सुख की तासीर –

1. समय/मात्रा/संख्या के साथ घटता है ।
2. सुख देने वाली वस्तु से अलगाव अवश्यंभावी होता है ।
3. सुख का अंत दु:खमय होता है ।
4. सुख क्षणिक होता है ।

जबकि धर्म का सुख इनके विपरीत होता है ।

अनुमान अप्रत्यक्ष, अनुभव प्रत्यक्ष ।
कभी कभी अनुमान अनुभव से ज्यादा कारगर हो जाता है, जैसे ज़हर खाने से मृत्यु हो जाती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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