क्या झगड़े को आधे में रुकवाना न्यायसंगत है ?
क्योंकि एक पक्ष घाटे में रह सकता है !
अग्नि को किसी भी Stage पर बुझाना न्यायसंगत है ।
झगड़ा बढ़ने पर दोनों पक्ष घाटे में रह जाते हैं ।
चिंतन
नियम – कार को Left Side में चलाना,
उपयोग – ध्यान Driving से हटा तो दुर्घटना घटी,
प्रयोजन – कहाँ पहुँचना है !
जिनके जीवन में ये तीनों होते हैं वे ही मंजिल पर पहुँचते हैं ।
पुराने व्यक्ति और टेप रिकार्डर में एक सी समस्या होती है –
दोनों की सुई एक जगह/बात पर अटक जाती है ।
समाधान – जानकार/गुरु की सहायता से निकालना पड़ती है ।
चिंतन
छोटा सा जुगनू पूरे आकाश के अंधकार पर भारी पड़ जाता है ।
हमारे हृदय का अज्ञान भी ज्ञान के दीपक से समाप्त हो सकता है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पुराने पुण्य को पाप में इन्वेस्ट करने पर पैसा कमाया जाता है ।
तो कम से कम, पाप से कमाया हुए पैसे को पुण्य में इन्वेस्ट करके भविष्य के लिये तो पुण्य संजोलो ।
कितना चल लिये मत पूछो, कितना चलना है, यह भी मत पूछो;
बस नीचे निगाह करते हुये (जीव रक्षा करते हुये) चलते रहो, मंज़िल अपने आप सामने आ जायेगी ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Always ignore hateful attitude & rude behavior of the people.
They are powerless without your response.
((Mr. Sanjay)
बच्चों को याद करायें –
1. पाप से भय
2. संवेदनशीलता
3. धर्म कुल का गौरव
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
दिल से ज्यादा “ऊपजाऊ” जगह और कोई नहीं है !
क्योंकि यहाँ जो कुछ “बोया” जाये,बढ़ता ज़रूर है !!
फिर चाहे वो “प्यार” हो…….
या “नफरत” ……………..|
सुरेश
घर के मुखिया की हालत उस टिन के शैड जैसी होती है जो बारिश, तूफान, ओलावृष्टि सब झेलता है, लेकिन उसके नीचे वाले कहते हैं कि यह शोर बड़ा करता है और गरम भी जल्दी हो जाता है।
(डॉ.पी.एन.जैन)
कितना महफूज़ था गुलाब,
काँटों की गोद में….
लोगों की “मोहब्बत” में,
पत्ता-पत्ता बिखर गया….!
अरविंद
गुरूर में इंसान को कभी इंसान नहीं दिखता,
जैसे
छत पर चढ़ जाओ,
तो
अपना ही मकान नहीं दिखता ।
नीलम
सत्य को ख्व़ाहिश होती है…
कि…
सब उसे पहचानें
और
झूठ को हमेशा डर लगता है…
कि…
कोई उसे पहचान न ले ।
मंजू
पाप से भी बड़ा पाप है – “पाप को स्वीकार ना करना” ।
स्वीकार करते ही वह प्रायश्चित बन जाता है, तप कहलाता है ।
अंजन चोर भी निरंजन बन जाता है ।
पुण्य से भी बड़ा पुण्य है – “अपने आप को पापी कहना” ।
मुनि श्री सुधासागर जी
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