त्याग की मूर्तियों के सामने गृहस्थों का सम्मान करना कहाँ तक उचित है ?
त्यागियों के सामने त्याग का सम्मान करना तो तर्कसंगत है ही पर पुण्यात्माओं का सम्मान करना भी गलत नहीं है क्योंकि उनमें त्याग की संभावनाएं रहती हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 9 नवंबर)

(सामने वाले का पुण्य भी रहता है भले ही त्याग ना किया हो और पुण्यवान आकर्षित करेगा ही।)

प्रगति/ बढ़ते हुए को अच्छा माना जाता है, सुंदर कहा जाता है पर ढलता हुआ सूरज क्यों ज्यादा सुंदर लगता है ?

योगेंद्र

आध्यात्मिक/ परिपक्व दृष्टि से संसार जब घटता है तो बहुत सुंदर लगता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 अक्टूबर)

कहते हैं जिसका ध्यान करो वह मिल जाता है, अनुभव कहता है ज़रूरी नहीं।
जैसे दो मित्र एक ही ऑफिस में थे, एक सोचते हुए जाता था… कहीं दुर्घटना घटित न हो जाए और उसके प्राय: दुर्घटना होती थी। दूसरा मित्र सोचता हुआ जाता था ऑफिस में जाकर क्या काम करना है, उसके कभी दुर्घटना घटित नहीं हुई।
ध्यान और इच्छा दोनों विचार हैं पर ध्यान में विचार के साथ विश्वास होता है और इच्छा में विचार के साथ भय।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 अक्टूबर)

प्लास्टिक, पर्यावरण के लिए तो सबसे नुकसान दायक चीज तो है ही; धर्म के अनुसार भी प्रयोग करने लायक नहीं है, हिंसक/ अपवित्र है।
खाद्य पदार्थ प्लास्टिक की थैलियों में रख कर फेंक दिये जाते हैं। कितनी गाय आदि तड़प-तड़प के मर जाती हैं। जो गाय आदि की हिंसा करते हैं, उनसे भी ज्यादा दोष प्लास्टिक प्रयोग करने वाले को लगता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 12 नवंबर)

जब तक सर्प पिटारे के अंदर रहता है उसकी पूजा होती है, बाहर आने पर पिटायी।
मनुष्य जब तक अपने में रहता है, लोगों का सम्मान पाता है। दूसरों के कामों में टांग अड़ाता है/ उनकी आलोचना करता है तब ख़ुद आलोचना का पात्र/ अपमानित होता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 2 अक्टूबर)

संग्रह गृहस्थ के लिए आवश्यक है लेकिन उसे संग्रह के प्रति यदि मूर्छा आ जाती है तो वह परिग्रह का रूप धारण कर लेती है। जो दिन रात ग्रहों की तरह आसपास मँडराते रहते हैं, हम उसकी गिरफ़्त में आ जाते हैं।
जोड़ो वही जो छोड़ते समय तकलीफ न दे।
रावण के पास रानियों की क्या कमी थी ! मूर्छा के कारण ही उसने अधोगति प्राप्त की।
आज तो सबसे बड़ी परिग्रह मोबाइल है, जिसकी गिरफ़्त में हम सब हैं। उपवास से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, डिजिटल उपवास

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 अक्टूबर)

रिक्त को भरने की मनाही नहीं, अतिरिक्त में दोष है।

फिर चाहे वह भोजन हो या धन।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

शरीर, सम्पत्ति तथा समय हमको सहजता से प्राप्त हुआ, सहजता प्राप्त करने के लिये।
विडम्बना… हमने इसे ही असहजता प्राप्त करने के लिये उपयोग कर लिया है।

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

मन और पानी का एकसा स्वभाव होता है… जिन परिस्थितियों/ बर्तन में जाता है इसी का आकार ग्रहण कर लेता है। दूसरा… जहाँ ढलान मिल जाए वहीं चला जाता/ बहने लगता है।
यदि आकार को स्थिर रखना हो तो पानी को जमा देते हैं/ मन को संकल्पों से बांध देते हैं। तब पानी/ मन की 3D अवस्था हो जाती है… आचरण रूपी तीसरा डाइमेंशन भी आ जाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 1 अक्टूबर)

बनावटी जीवन की पोल तब खुल जाती है जब उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 अक्टूबर)

(जैसे कर्ण की विद्याएं तब काम नहीं आयीं जब उनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी)।

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