राम के बिना मांगे, राज्य दिया;
माँ, बिना मांगे भोजन देती है;
भगवान से मांगने की जरूरत नहीं, बिना मांगे मिलेगा ।
ज्योति की कालिख़, धुंआ है ।
(मानवीय गुणों की कालिख़ आलोचना है)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अकारण सुख प्राप्ति को आनंद कहते हैं।
(श्रीमति शर्मा)
कारणों में सुख ढूढना बंद कर दें, तब आत्मा का स्वाभाविक आनंद स्वत: ही आने लगेगा।
कर्मोदय के विपरीत परिणामों को रखना पुरुषार्थ है ।
अज्ञानी दूसरों पर क्रोध करता है,
ज्ञानी अपने पर ।
जीवन/संगीत/पूजा सब में उचित अनुपात बहुत जरूरी है, तभी आनंद आयेगा, क्रिया कार्यकारी होगी । अनुपात बिगड़ा, आपात स्थिति आती है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
अंतरंग का परिवर्तन सत्संग से ही संभव है ।
परिवर्तन से ही परिवर्धन होता है ।
संत ना बन सकें तो सज्जन तो बन सकते हैं ।
धर्म क्या है ?
अधर्म का अभाव ही धर्म है ।
(और अधर्म को तो हम सब खूब समझते ही हैं)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
चोर साधुओं के पास इसलिये नहीं जाते, क्योंकि उनके पास वह सब नहीं है जो उन्हें चाहिये ।
यदि हम भी उनके पास नहीं जा रहे है हैं तो हम क्या हुए !!
मुनि श्री सुधासागर जी
पहले समय में पदयात्रा मज़बूरी थी, आज तप/धर्म है ।
धर्म की भावना देर तक चलती है ।
अहिंसा का पालन होता है ।
भाग्य = अलग अलग size के घड़े ।
पुरुषार्थ = अपने अपने घड़ों को कम ज्यादा भरना ।
सौरभ – नोयड़ा
आत्मा कमरा है,
मन खिड़की, जिसके सहारे से आत्मा जानती है ।
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