साधुजन साहूकारों जैसी निद्रा लेते हैं – अल्प और जागरूक ।
साहूकार अपनी निधि की रक्षा हेतु जागरुक रहता है,
साधु आत्मरूपी अमूल्य निधि की रक्षा हेतु ।

रत्नत्रय – 3

साधु ब्राम्हण होता है – ज्ञान की अपेक्षा,
साधु वैश्य होता है – हमेशा फ़ायदे का काम करता है ,
साधु क्षत्रिय होता है – निडर,
साधु शूद्र होता है – दूसरों के विकारों को धोता है ।

क्षु. श्री धैर्यसागर जी

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है कि ना तो हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं ,
और ना ही स्वयं को लात मार सकते हैं।
इसलिए हमारे जीवन में मित्र और आलोचक होने ज़रुरी हैं ।

(शशि)

जनसाधारण जन्म से खुश, मरण से डरता है;
साधुजन मृत्यु का महोत्सव मनाते हैं, जन्म से डरते हैं (गर्भ की पीड़ा/बार-बार जन्म से) ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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