साधुजन साहूकारों जैसी निद्रा लेते हैं – अल्प और जागरूक ।
साहूकार अपनी निधि की रक्षा हेतु जागरुक रहता है,
साधु आत्मरूपी अमूल्य निधि की रक्षा हेतु ।
रत्नत्रय – 3

(सुरेश)
क्या गुरु/भगवान सामर्थ्यवान नहीं है ?
माचिस उसी दीपक को जला सकती है, जिसमें तेल हो/जलने की योग्यता हो ।
मुनि श्री सुधासागर जी
सिर झुकाने की ख़ूबसूरती भी क्या कमाल की होती है..
धरती पर सर रखो और दुआ आसमान में क़बूल होती है ।
(मंजु)
जानने की इच्छा, जिज्ञासा/Curiosity है ; शंका नहीं ।
साधु ब्राम्हण होता है – ज्ञान की अपेक्षा,
साधु वैश्य होता है – हमेशा फ़ायदे का काम करता है ,
साधु क्षत्रिय होता है – निडर,
साधु शूद्र होता है – दूसरों के विकारों को धोता है ।
क्षु. श्री धैर्यसागर जी
ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है कि ना तो हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं ,
और ना ही स्वयं को लात मार सकते हैं।
इसलिए हमारे जीवन में मित्र और आलोचक होने ज़रुरी हैं ।
(शशि)
जनसाधारण जन्म से खुश, मरण से डरता है;
साधुजन मृत्यु का महोत्सव मनाते हैं, जन्म से डरते हैं (गर्भ की पीड़ा/बार-बार जन्म से) ।
मुनि श्री सुधासागर जी

(श्रीमति शर्मा)
राम के बिना मांगे, राज्य दिया;
माँ, बिना मांगे भोजन देती है;
भगवान से मांगने की जरूरत नहीं, बिना मांगे मिलेगा ।
ज्योति की कालिख़, धुंआ है ।
(मानवीय गुणों की कालिख़ आलोचना है)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अकारण सुख प्राप्ति को आनंद कहते हैं।
(श्रीमति शर्मा)
कारणों में सुख ढूढना बंद कर दें, तब आत्मा का स्वाभाविक आनंद स्वत: ही आने लगेगा।
कर्मोदय के विपरीत परिणामों को रखना पुरुषार्थ है ।
अज्ञानी दूसरों पर क्रोध करता है,
ज्ञानी अपने पर ।
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