आ. शांतिसागर जी महाराज जब हैदराबाद में प्रवेश किये तो कुछ लोगों ने निज़ाम से उन पर रोक लगाने को कहा ।
तब निज़ाम ने कहा था – “हमारे राज्य में नंगों के विचरण पर रोक है, फ़रिश्तों के विचरण पर नहीं” ।

चक्की के दो पाटों में से एक स्थिर और दूसरा गतिमान हो…… तभी अनाज पिसता है ।

इसी प्रकार मनुष्य में भी दो पाट होते हैं….   
एक मन और दूसरा तन…                          
यदि मन स्थिर और तन गतिमान रहे…
तभी सफल व्यक्तित्व संभव है….

(मुनीष-देहली)

सूप बेकार को छोड़ता है – साधु ।
छलनी बेकार को ग्रहण करती है – गृहस्थ ।।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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