आ. शांतिसागर जी महाराज जब हैदराबाद में प्रवेश किये तो कुछ लोगों ने निज़ाम से उन पर रोक लगाने को कहा ।
तब निज़ाम ने कहा था – “हमारे राज्य में नंगों के विचरण पर रोक है, फ़रिश्तों के विचरण पर नहीं” ।
बीज और खेत गृहस्थ के,
फसल (धर्म की) उगाता है साधु,
खाते दोनों मिलकर हैं ।
अच्छा तो अपने कर्मों से होता है,
अच्छाई भगवान/गुुुुरु की भक्ति से ।
चिंतन – एकता पुणे
चक्की के दो पाटों में से एक स्थिर और दूसरा गतिमान हो…… तभी अनाज पिसता है ।
इसी प्रकार मनुष्य में भी दो पाट होते हैं….
एक मन और दूसरा तन…
यदि मन स्थिर और तन गतिमान रहे…
तभी सफल व्यक्तित्व संभव है….
(मुनीष-देहली)

(Suresh)
भूत को Dustbin मानो,
भविष्य को Notice Board,
और वर्तमान को Writing Pad(for Notice Board) (पर WritingPad Dustbin से मत लेना-पुश्किन)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
ये भय/अभाव के निवारण के लिये नहीं,
बल्कि निर्भय होने तथा प्राप्ति की अभिलाषा ही समाप्त करने के लिये होती हैं ।
सबसे सीधा/शरीफ़ शरीर ही होता है ।
बेशकीमती होते हुए भी प्राय: इसे गंदे से गंदे/साधारण से भी साधारण कार्यों में लगाया जाता है पर ये उफ़ तक नहीं करता ।
दुःख का कारण, धर्म का अभाव,
सुख का कारण, धर्म का प्रभाव,
और…
शांति का कारण, खुद का स्वभाव ।
(ब्र.संजय)
सूप बेकार को छोड़ता है – साधु ।
छलनी बेकार को ग्रहण करती है – गृहस्थ ।।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
बर्तन बाहर से मांजने पर शुद्ध दिखता है,
पर उपयोगता अंदर की शुद्धता से ही होती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आतंक धर्म कैसे हो सकता है !
क्योंकि धर्म तो आतंक को समाप्त करने के लिये होता है ।
झूठ से सब नफ़रत करते हैं, फिर झूठ बोलता कौन है ?
नफ़रत करते हैं, यही झूठ है ।
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