अकारण सुख प्राप्ति को आनंद कहते हैं।

(श्रीमति शर्मा)

कारणों में सुख ढूढना बंद कर दें, तब आत्मा का स्वाभाविक आनंद स्वत: ही आने लगेगा।

जीवन/संगीत/पूजा सब में उचित अनुपात बहुत जरूरी है, तभी आनंद आयेगा, क्रिया कार्यकारी होगी । अनुपात बिगड़ा, आपात स्थिति आती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

चोर साधुओं के पास इसलिये नहीं जाते, क्योंकि उनके पास वह सब नहीं है जो उन्हें चाहिये ।
यदि हम भी उनके पास नहीं जा रहे है हैं तो हम क्या हुए !!

मुनि श्री सुधासागर जी

अपने पराये का भेद ही संसार है ।
असल में ना कोई अपना है, ना पराया;
सब अपने अपने हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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