दुकानदार माल से मालदार नहीं,
भावों से मालदार बनता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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(Dr.Amit)
प्रतिभा का विकास, अनुकूल परिस्थिति में,
चारित्र का विषम, परिस्थितियों में ।
क्रिया शरीर से,
भाव मन से,
अभिप्राय उपयोग से ।
प्रवृत्ति में बदलाव – क्रियात्मक प्रगति,
वृत्ति में बदलाव – गुणात्मक प्रगति ।
अधर्म से बचना ही धर्म है ।
Grand father saw it in river,
Father saw it in well,
We saw in tap,
Our children see in bottle,
Where will our grand children see it !
Please SAVE water.
“गु” यानि अंधकार से,
“रु” यानि प्रकाश की ओर ले जाने वाले ।
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(Mrs.Sharma)
अच्छाई की ओट में ही बुराई पनपती है ।
गिरती हुई दीवार से हर कोई बचता है ।
इनसानियत गीली भूमि है ।
इस पर ही धर्म का अंकुर पनपता है ।
जो निशुल्क है, वही सबसे ज़्यादा क़ीमती है..
“नींद, शान्ति, आनंद, हवा, पानी, प्रकाश और सबसे ज़्यादा, हमारी साँसें” ।
(आर.के.गुप्ता)
शतरंज का एक नियम बहुत ही उमदा है –
चाल कोई भी चलो पर
अपने वालों को नहीं मार सकते…..
काश ये नियम इनसानों में भी होता…….
(सुरेश)
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