इतने धर्मानुष्ठान होने पर भी पाप बढ़ क्यों रहे हैं ?

क्योंकि धर्मानुष्ठान से ज़्यादा पापानुष्ठान हो रहे हैं, जानवरों के कत्ल की चीखों की आवाज़ों में मंत्रोचार की आवाज़ें दब जाती हैं।
आज जो कुछ धर्म बचा है, वह उन्हीं धर्मानुष्ठानों के कारण है ।

संसारी जीव करुणा करते हैं, निमित्त के सहारे से ।
गुरु/भगवान करुणामय रहते हैं, उनको निमित्त की ज़रूरत नहीं;
इसलिए अच्छे बुरे निमित्त का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता ।

मीठे पानी की नदी खारे समुद्र में क्यों गिरती है ?

महत्त्वाकाँक्षा की वजह से,
ऐसे व्यक्तियों का हश्र भी ऐसा ही होता है,
अपना अस्तित्व खो देते हैं ।

सबको अपने अपने गुणों को बढ़ाना चाहिए ।

गुण/अवगुण तो सबमें होते हैं,
पर धर्म से गुणों में स्थिरता आती है जैसे दूध का दही बन जाता है।
धर्म अवगुणों से ऊपर उठा देता है जैसे मक्खन ऊपर आ जाता है ।

चिंतन

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