समुद्र में नहाने का सुख विषय-भोग का सुख है –
जब तक नहाये आनंद, बाद में खुजली, मीठे जल से नहाना होता है ।

संसारी जीव करुणा करते हैं, निमित्त के सहारे से ।
गुरु/भगवान करुणामय रहते हैं, उनको निमित्त की ज़रूरत नहीं;
इसलिए अच्छे बुरे निमित्त का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता ।

मीठे पानी की नदी खारे समुद्र में क्यों गिरती है ?

महत्त्वाकाँक्षा की वजह से,
ऐसे व्यक्तियों का हश्र भी ऐसा ही होता है,
अपना अस्तित्व खो देते हैं ।

सबको अपने अपने गुणों को बढ़ाना चाहिए ।

गुण/अवगुण तो सबमें होते हैं,
पर धर्म से गुणों में स्थिरता आती है जैसे दूध का दही बन जाता है।
धर्म अवगुणों से ऊपर उठा देता है जैसे मक्खन ऊपर आ जाता है ।

चिंतन

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April 8, 2022

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