जानवर विजातियों को दूध पिलाते हैं, मनुष्य जेठानी, देवरानी के बच्चे को नहीं ।
शक्कर तो सबके कपों में होती है, कुछ उसे घोल लेते हैं (जीवन में),
कुछ ज़िंदगी भर फीकी चाय ही पीते रहते हैं, शक्कर बची रह जाती है, बरबाद हो जाती है ।
गुण/अवगुण तो सबमें होते हैं,
पर धर्म से गुणों में स्थिरता आती है जैसे दूध का दही बन जाता है।
धर्म अवगुणों से ऊपर उठा देता है जैसे मक्खन ऊपर आ जाता है ।
चिंतन
भाव सहित बिना माला (उँगलियों पर) के भी मालामाल हो सकते हैं ।
भाव रहित सोने की माला फेरने से भी सूने रह सकते हैं ।
गाय को पानी/दाना दो, तो दूध मिलता है ।
साँप को दूध पिलाओ, तो ज़हर मिलता है ।
नीचे से ऊपर (वालों साधु आदि) का अनुमान गलत ही होगा,
ऊपर से नीचे देखने पर तो चक्कर आ जाते हैं ।
सही एहसास/अनुमान समान धरातल पर आने पर ही होता है ।
आम आदमी को मांसाहार में हिंसा के बारे में कम,
शाकाहार के फायदे,
शरीर की निरोगता,
भावों पर असर/संवेदनशीलता के बारे में ज़्यादा समझाऐं ।
“समय” जब नाच नचाता है ना साहिब !
तब सारे सगे-संबंधी काेरियाेग्राफर बन जाते हैं !!
(डॉ.अमित राजा)
सुंदर मोर* कम होते जा रहे हैं,
जो हैं उनकी आवाज़ शोर शराबे में सुनाई नहीं देती है ।
उन्हें देखने/सुनने सुबह जल्दी उठकर, उनके पास जाना होता है।
चिंतन
*अच्छे इनसान/साधु जन
ग़लतफ़हमियों के सिलसिले इतने दिलचस्प हैं…..
हर ईंट सोचती है, दीवार मुझ पर टिकी है…..!!
(सुरेश)
जब भी मैं रोया करता,
माँ कहती…
ये लो शीशा,
देख इसमें
कैसी तो लगती है !
रोनी सूरत अपनी,
अनदेखे ही शीशा
मैं सोच-सोचकर
अपनी रोनी सूरत
हँसने लगता ।
एक बार रोई थी माँ भी
नानी के मरने पर
फिर मरते दम तक
माँ को मैंने खुल कर हँसते
कभी नहीं देखा,
माँ के जीवन में शायद
शीशा देने वाला
अब कोई नहीं था ।
सबके जीवन में ऐसे ही
खो जाता होगा
कोई शीशा देने वाला ।
_✍????गुरुवर मुनि श्री क्षमा सागर जी ????
अबके = आज के धनाढ़्य,
तबके = साधु,
न अबके, न तबके = भिखारी ।
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