परमार्थ से अर्थ का महत्त्व जब बढ़ जाता है,
तब,
हम स्वार्थी बन कर अनर्थ की ओर बढ़ जाते हैं ।

एक बार संख्या 9 ने 8 को थप्पड़ मारा ,
8 रोने लगा…
पूछा मुझे क्यों मारा..?
9 बोला…
मैं बड़ा हूँ, इसीलिये मारा ।

सुनते ही 8 ने 7 को मारा
और 9 वाली बात दोहरा दी ।
7 ने 6 को..
6 ने 5 को…..
अंत में 2 ने 1 को ।

अब 1 किसको मारे ?
1 के नीचे तो 0 था !

1 ने उसे मारा नहीं,
बल्कि प्यार से उठाया
और उसे अपनी बगल में बैठा लिया ।

जैसे ही बैठाया…
उसकी ताक़त 10 हो गयी !
और 9 की हालत खराब हो गई ।

ज़िंदगी में किसी का साथ ही काफ़ी है,
कंधे पर किसी का हाथ ही काफ़ी है ।

(सुरेश)

गन्ने में जहाँ गाँठ होती है वहाँ रस नहीं होता,
जहाँ रस होता है वहाँ गाँठ नहीं होती ।

बस, जीवन भी ऐसा ही है यदि मन में किसी के लिये नफ़रत की गाँठ होगी तो हमारा जीवन भी बिना रस का बन जायेगा…..

(आर.के.गुप्ता)

* धन तभी सार्थक है,
जब धर्म भी साथ हो।

* विशिष्टता तभी सार्थक है,
जब शिष्टता भी साथ हो।

* सुंदरता तभी सार्थक है,
जब चरित्र भी शुद्ध हो।

* सम्पति तभी सार्थक है,
जब स्वास्थ्य भी अच्छा हो।

* देवस्थान गमन तभी सार्थक है,
जब हृदय में भाव हो।

* विद्वता तभी सार्थक है,
जब सरलता भी साथ हो।

* प्रसिद्धि तभी सार्थक है,
जब मन में निरअहंकारिता हो।

* बुद्धिमता तभी सार्थक है,
जब विवेक भी साथ हो।

* परिवार का होना तभी सार्थक है,
जब उसमें प्यार और विश्वास हो।

(नमिता-सूरत)

मनुष्य का अपना क्या है..!?

– जन्म : दूसरों ने दिया,
– नाम : दूसरों ने रखा,
– शिक्षा : दूसरों ने दी,
– रोजगार : दूसरों ने दिया,
और . . .
– शमशान : दूसरे ले जाऐँगे.

-तो व्यर्थ मेँ घमंड़ किस बात पर करते हैँ लोग ??

(श्रीमति एकता – पुणे)

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