यानि मायाचारी का उल्टा, सरलता का धर्म ।
हम ये सोचते हैं की मायाचारी करके हम फायदे में हो जायेगें, कुछ समय तक तो अपने को फायदा लगता है, जैसे रावण ने सीता को हरा तो बहुत खुश हुआ ,पर उसका अंत कैसा हुआ ! शकुनी/दुर्योधन को देखो सबका अंत कैसा हुआ ?

मान करने से नीच गोत्र का बंध होता है, अपनी प्रशंसा, दूसरों की निंदा करना भी मान का ही रूप है।
मान को अपने जीवन से हटाने के लिये दूसरों के गुणों की प्रशंसा करें।

खाज को खुजाने में सुख तो है,
पर यह सांसारिक सुख है ।
खाज होना ही नहीं, आत्मिक सुख है ।

सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति में सुख है,
पर इच्छाऐं होना ही नहीं आत्मिक सुख ।

भगवान/गुरू/शास्त्र को ऊँचे आसन पर क्यों बैठाते हैं ?
दीपक को ऊँचे आसन पर क्यों रखते हैं ?

ताकि प्रकाश अधिक से अधिक स्थान तक पहुँचे ।

मुनि श्री तरुणसागर जी

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April 8, 2022

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