प्रश्न: पाप का अनर्थफल क्या है ?
उत्तर: मन का अस्तव्यस्त/अशांत होना।
-आचार्य श्री अमोघवर्ष कृत प्रश्नोत्तर-रत्नमाला (गाथा सं 15)

यह पाप का प्रत्यक्ष/तुरंत मिलने वाला दंड है। पाप का अप्रत्यक्ष दंड समाज/क़ानून से मिलता है। अकेले में की गयी ग़लती का किसी के सामने बयान करने का साहस नहीं होता। दूसरों की नज़रों में गिरना स्वयं की नज़र में गिरने से कम दुखदायी है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी का हाइकु:

कोई देखे तो
लज्जा आती, मर्यादा
टूटने से ना।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 मई)

समाधिमरण के समय संबोधन कम करना चाहिए। शरीर शिथिल हो रहा होता है, अधिक संबोधन अतिभारारोपण हो जाएगा और उसके भाव ख़राब हो सकते हैं। व्यक्ति के भावों को महसूस करें, उसके प्रति सद्भाव रखें, आसपास का वातावरण पवित्र और धार्मिक बनायें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 1 मई)

नीर नहीं तो,
समीर सही प्यास,
कुछ तो बुझे।

भावार्थ – अत्यधिक गर्मी में पानी भले न मिले परन्तु ठंडी हवा चलती रहे तो प्यास में कमी तो आती है। उसी प्रकार पंचम काल में भले ही केवली/ श्रुतकेवली का समागम प्राप्त नहीं है किन्तु ठंडी हवा के समान आचार्य, उपाध्याय, साधु अथवा समीचीन देव-शास्त्र-गुरु तो उपलब्ध हैं जो हमारा मोक्षमार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

एक दीपक दूसरे को प्रकाशित करते समय अपनी बाती/ घी/ प्रकाश नहीं देता फ़िर भी दूसरा प्रकाशित हो जाता है/ उसके जीवन से अंधकार समाप्त हो जाता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आज पलायन बहुत हो रहा है। गांव से शहर, शहर से मेट्रो और मेट्रो से विदेश जाने होड़ लगी हुई है।
बच्चों को बाहर भेजने से पहले उनकी परीक्षा कर लें/ उनको नियम दिला दें जैसे विवेकानंद जी/ गांधी जी की मांओं ने किया था। योग्य बच्चों को परीक्षा करने तथा नियम में बांधनेे के बाद उनके बिगड़ने की संभावना कम हो जाती है तथा अपने देश वापस आने की भी बढ़ जाती है।

मुनि श्री निश्चल सागर जी (प्रवचन – 1 मई)

पुण्य का त्याग कैसे करें ?
इतना कितना पुण्य जमा कर लिया है कि त्याग करना चाहते हो/ त्याग करने की नौबत आ गयी ?
(पुण्य का त्याग नहीं, पुण्य के फल का त्याग होता है और वह हम करना चाहते नहीं)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

क्या रावण को धर्मात्मा कहें क्योंकि वह विद्वान के साथ-साथ पूजा/पाठ भी बहुत करता था ?
लेकिन उसका उपयोग सीता जी में था इसलिए वह अधर्मी ही कहा जाएगा।

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

इंद्रियों आदि के कार्य…
सिर्फ़ ग्रहण करते हैं… कान, आँख, नाक, रसना, स्पर्श इंद्रियां, माथा(आशीर्वाद), पैर (मंजिल)
सिर्फ़ त्याग करते हैं… फेफड़े (गंदी हवा)
ग्रहण भी और त्याग भी… मन के द्वारा हालांकि अच्छी चीजों का कम, बुरी का ज्यादा, हाथ (त्याग करते समय छोटे हो जाते हैं, लेते समय फैल जाते हैं)।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 मार्च)

Positive Thinking…जैसे आशीर्वाद मिलेगा ही। सोच को बदलते रहना चाहिए।अस्थाई। अपेक्षा सहित।
Real Thinking…….जैसे गुरुओं/ बड़ों को नमस्कार हमेशा करूंगा, आशीर्वाद मिल भी सकता है या ना भी मिले। असफलता को स्वीकारना। स्थाई। अपेक्षा रहित।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 मार्च)

मुक्ति के दो प्रकार –

  • रस्सियों (कर्मों की) को तोड़कर भागना। इसके लिए बलशाली होना पड़ेगा। जितने कर्म बंध रहे हैं, उससे ज्यादा तोड़ें।
  • नयी रस्सियों बांधना बंद कर दें। पुरानी समय आने पर सड़-सड़ कर गिरती रहेंगी।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

उच्छवास/ Inhale – श्वास अंदर लेना।
प्राण/ अपान/ श्वास/ Exhale – बाहर निकालना।
श्वास अंदर लेते हैं तो बाहर भी निकालना ज़रूरी है, अन्यथा प्राण बाहर निकल जायेंगे। धर्म में निकालने को प्राण कहा है।
जितनी कमाई करो उसी के अनुपात में दान न होगा तो Balance कैसे होगा !

चिंतन

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