जानवर राग तथा द्वेष में एक सी भाषा बोलते हैं (जैसे कुत्तों का भौंकना)।
मनुष्य राग में तो राग/ मोह करता ही है, द्वेष का कारण भी राग/ मोह होता है।

चिंतन

शेर की +ve Thinking थी कि उस पर कोई मुसीबत नहीं आ सकती।
लेकिन उसके पास Power Thinking नहीं थी, मुसीबत किसी पर भी आ सकती है।
उस समय के लिये चूहे से दोस्ती जरूरी थी।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

दो मिलते जुलते शब्द हैं सेलफिशनेस और दूसरा सेल्फओरिएंटेड। तुच्छ उपलब्धियां के पीछे भागना सेल्फिश्नेस है जबकि सेल्फओरिएंटेड को उच्च उपलब्धियां मिलती हैं। निःस्वार्थ सेवा सेल्फओरिएंटेड ही कर सकता है, सेल्फिश तो कहेगा क्यों करूँ ?

मुनि श्री सौम्य सागर जी (डाक्टर सम्मेलन – प्रवचन – 2 मार्च)

दुःख में साक्षी भाव कैसे रखें ?
पक्षियों की दृष्टि बना लें। ऊपर से जब वे गंदे नाले को देखते हैं, वह भी सुंदर दिखता है। अपने आप को इतना ऊपर उठा लो कि बुराइयाँ भी बुरी न दिखें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 2 मार्च)

गेंद कीचड़ में फेंकी तो दिखेगी नहीं जैसे मकान में लगा हुआ पैसा।
बालू पर फेंकोगे तो लौटेगी नहीं, पर दिखेगी… दुकान में लगा पैसा।
दीवार पर फेंकी तो उतनी ही तेजी से लौट कर आएगी… धर्म में लगा पैसा।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 मार्च)

एक सेठ ने अपने अंतिम समय में विशाल मीनार बनवाना शुरू किया। अलग-अलग प्रांतों से सबसे बेहतरीन ठेकेदारों को बुलाया गया। 1 साल का समय दिया। आर्थिक आदि किसी तरह की रुकावट नहीं थी फिर भी 3 महीने तक प्रगति नहीं हुई।
कारण ?
जब ईंट मांगी जाती तो पत्थर आ जाता क्योंकि अलग-अलग प्रांतों की भाषाएँ अलग-अलग हैं।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा होता है,फिर राष्ट्रीयता कैसे आएगी!

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 मार्च)

घर की पवित्रता मात्र अग्नि से ही नहीं होती है। अग्नि तो शमशान में सबसे ज्यादा है। पवित्रता तो घर में गुरुओं के चरण पड़ने से होती है, जिनके पवित्र उपदेश घर को पवित्र करते हैं। इसीलिए कहा है जिस घर में गुरु के चरण नहीं पड़ते वह घर शमशान है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 1 मार्च)

3 प्रकार की बुद्धि –>

  • भरम बुद्धि – निर्वेग।
    एक चरवाहा 100 भेड़ें लेकर लौट रहा एक आगे चली गयी, दूसरी बहुत पीछे, 98 साथ थीं पर चरवाहा कभी आगे वाली को संभालता कभी पीछे वाली को, 98 से हाथ धो बैठा।
  • चरम बुद्धि – आवेग।
    Accident के बाद घड़ी की चिंता जबकि हाथ ही कट गया था।
  • नरम बुद्धि – संवेग।
    साधु प्रवृत्ति।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

लंका विजय के दौरान पुल बनाते समय हनुमान राम का नाम लिखकर पत्थर समुद्र में छोड़ते थे तो तैरने लगता था। राम ख़ुद पत्थर डालते थे तो डूब जाता था (जिसने राम को छोड़ दिया वह तो डूबेगा ही)।
यह चमत्कार देख लंकावासी बहुत प्रभावित हुए। रावण ने भी यह चमत्कार करके दिखाया उसका छोड़ा हुआ पत्थर भी समुद्र में तैर गया। कारण ? पत्थर छोड़ते समय वह कहता था तुझे राम की सौगंध डूबना मत।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 मार्च)

इच्छाओं को कैसे नियंत्रित करें ?
किसी मैदान में रेत बिखरी हुई है; उसका स्तर कैसे उठायें ?
रेत को समेट लें; स्तर उठ जाएगा।
इच्छाओं को भी नियंत्रित करने का यही तरीक़ा है कि उनको समेट लिया जाए।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 28 फ़रवरी- सेंट्रल जेल – ग्वालियर)

ज्ञानी अपराध होने पर सज़ा चाहता है/ मांगता है, मिलने पर खुश।
अज्ञानी सज़ा मिलने पर जेल तोड़कर भागना चाहता है।
जिन पर मुसीबत ज्यादा उनका नाम ज्यादा जैसे राम/ पार्श्वनाथ भगवान।
सुखी होना चाहते हो तो दु:ख में दुखी मत होना।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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