चोरी* करने की अनुकूलता/ कर पाना/ सफलता मिलना पुण्योदय से।
चोरी करने में पाप-बंध।
फल ?
पापोदय जैसे असाध्य रोग/ दुर्गति/ गरीबी आदि।

आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी

* ऐसे ही अन्य पाप क्रियाओं में लगाना।

मैं आत्मा हूँ
औरों से आत्मीयता
मेरी श्वास है।
(जब तक संसार में हूँ)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

तुलसी कृत रामायण में राम को विनम्र कहा, लक्ष्मण को नम्र।
नम्रता दूसरों से/ बाहर की स्थिति से संचालित होती है। विनम्रता स्वयं भीतर से तैयार होती है।
उत्साह के लिये आवेग भी जरूरी है पर उसमें सौम्यता बनी रहे, उग्रता न उतरे।

पं.विजय शंकर मेहता (अंजली)

मोबाइल की बैटरी 8% रह गयी। चार्जिंग पर लगाया फिर भी चार्जिंग घटती जा रही थी। 1% पर पहुंचकर बढ़ना शुरू हुई।
स्टॉक के पुण्य जब कम हो जाते हैं तब पुण्य की क्रियायें/ पुरुषार्थ काम करते हुए नहीं नजर आते हैं।
हाँ ! पुरुषार्थ लगातार सही दिशा में करते रहने से स्थिति सुधरने लगती है।

चिंतन

डॉक्टर का ऑपरेशन तो सफल हुआ, पर मरीज़ मर गया।
हम हर चीज सीमा में चाहते हैं, जैसे बाल, नाखून, कपड़े, पर संपत्ति की कोई सीमा नहीं निर्धारित करते।
कितना कमाना, किस कीमत पर कमाना !
संपत्ति के अर्जन, संरक्षण और संवर्धन, सब में अशांति/ आकुलता जुड़ी रहती है, सेहत खराब होती है, पारिवारिक जीवन समाप्त हो जाता है।
पर हम उस डॉक्टर की तरह इसे अपना सफल ऑपरेशन मानने लगते हैं; चाहे हम खुद समाप्त हो जाएं, या हमारा परिवार बिखर जाए!

आर्यिका पूर्णमति माता जी (3 अक्टूबर)

एक व्यक्ति जलेबी की दुकान पर एक किलो जलेबी खा गया।
पैसे ?
नहीं हैं।
मालिक ने पिटाई कर दी।
यदि जलेबी इस भाव खाने को मिलती है तो एक किलो और तौल दो।

आपकी सात्विकता पर व्यवहार भारी नहीं पड़ना चाहिये। बाहर की दुर्गंध अंदर तक नहीं जानी चाहिए/ प्रभावित नहीं करनी चाहिये।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

कैरम के खेल में चैंपियन वह नहीं बनता जिसका निशाना बहुत अच्छा हो। बल्कि वह बनता है जो अपनी अगली गोटी बनाना तथा दुश्मन की गोटी बिगाड़ना भी जानता हो।
हम भी परमार्थ में तभी सफल होंगे जब हम अगले भव को बनाने तथा बुराइयों को बिगाड़ना भी जानते हों।

चिंतन

WHO के अनुसार कोविड के पहले भी मानसिक अस्वस्थता 14% लोगों में पायी जाती थी।
धार्मिक लोगों में यह Rare होती है।
कारण ?
धर्म से दूर रहने वालों में असंतुष्टि।
कोविड के बाद 33% हो गयी है।
कारण ?
शारीरिक अस्वस्थता के साथ-साथ भय ज्यादा जुड़ गया था।
धार्मिकों में कोविड भी कम हुआ था, भय भी कम रहता है, क्योंकि वे कर्म-सिद्धांत पर ज्यादा विश्वास करते हैं।

डॉ. एस. एम. जैन

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