भगवान के चरण-चिह्न स्त्रियाँ छू सकती हैं, साधु के चरण क्यों नहीं ?

दादा जी का बहू लिहाज करतीं हैं, उनके फोटो का क्यों नहीं ?

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

संस्कार शिविरों के अनुभवों को तब तक याद रखें, जब तक उनसे ऊपर न उठ जाय (कई शिविरार्थी साधु बन गये जैसे मुनि श्री पूज्यसागर जी)।
कुएं में गिरे व्यक्ति को रस्सी तब तक पकड़े रखना चाहिये जब तक ऊपर न आ जाये।

जब तक व्यक्ति खुद अपने को संसार के लिये अर्थपूर्ण मानेगा, वह परमार्थ में अर्थहीन रहेगा।
जब संसार के लिये अर्थहीन हो जायेगा तब परमार्थ में उसका अर्थ शुरू होगा।

श्री लालमणी भाई

अपने सारे Tensions गुरु/ भगवान को Transfer कर दें। जैसे बचपन में माँ को Transfer करके सो जाते थे, वह जागकर ध्यान रखतीं थीं। पर उसके लिये आवश्यक है- पूर्ण विश्वास/ समर्पण।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

सही त्याग वस्तु का नहीं, उसके प्रति लगाव का होता है। इसीलिये तप को त्याग के पहले कहा जाता है। तप से मोह कम होता है, तब त्याग स्वतः ही हो जाता है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

भोगादि से भी कुछ सकारात्मक ले सकते हैं। इनका भी महत्व होता है।
भोग/ सुविधाओं को पूरा न भोगने से इच्छाओं का निरोध होता है, जिससे और-और पुण्य बंधते हैं, और-और भोग/ सुविधायें मिलती हैं।

चिंतन

मन तो कद से बड़ा पलंग चाहता है। मिल जाने पर और-और बड़ा माँगने लगता है।
हालांकि पहले से ज्यादा खाली हो जाता है, बाहर से भरा-भरा दिखाता है।
पर मन भरने पर संतोष और संतोष आने पर आत्मोत्थान शुरू हो जाता है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

“दान” शब्द का प्रयोग तो बहुत जगह होता है जैसे तुलादान, पर वह दान की श्रेणी में नहीं आयेगा।
ऐसे ही रक्तदान यह सहयोग/ करुणा में आयेगा, दान में नहीं।
धर्म में इसका निषेध नहीं है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

धर्म अंदर से भरता है। प्राय: यह भ्रम रहता है कि बाहर से भरता है इसीलिये धर्म पर से विश्वास घट रहा है।
धर्म (सार्वभौमिक है) और धार्मिक क्रियायें अलग-अलग हैं। भगवान को देखें पूर्ण अभावों में भी पूर्ण प्रसन्न।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

निमित्त तथा नियति को एक समय में एक को ही महत्व देने का मतलब उसकी अधीनता स्वीकार करना। लेकिन दोनों तथा अन्य कारणों (पाँचों संवाय जैसे स्वयं की क्षमतादि) को महत्व देने का मतलब किसी एक की अधीनता को नहीं स्वीकारना।

शांतिपथ प्रदर्शक

तिलक लगाने की परम्परा क्यों ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी… ठंडी में केसर (गरम होती है) का, गर्मियों में चंदन में कपूर मिलाकर लगाने से गर्म/ ठंडा मस्तिष्क रहता है, ऊर्जा मिलती है, ध्यान लगाने में सहायक।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

कर्ता, भोक्ता, स्वामित्व भावों को कर्तृत्व भाव कहते हैं। पर इनसे अहम् आने की सम्भावना रहती। ये भाव संसार तथा परमार्थ दोनों में आते हैं।

क्षु.श्री जिनेन्द्र वर्णी जी

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