जब तक मोह का ताज पहने रहोगे,
तब तक मोहताज ही रहोगे।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
एक समृद्ध व्यक्ति सत्संग में नहीं जाते थे। पत्नी के आग्रह पर एक दिन चले गये, सबने कहा “आइये”, “बैठिये” पर कथा शुरू होते ही सो गये, अंत तक सोते ही रहे। सब चले गये, आखिरी दरी वाले व्यक्ति ने उठाया, कहा “जाइये”।
पत्नी के पूछने पर बताया → 3 शब्दों की कथा थी….. आइये, बैठिये, जाइये।
पत्नी → चलो इन 3 शब्दों को भगवान की कथा मान कर याद रखना।
रात को इन शब्दों को दोहरा रहे थे। चोर घुसा। “आइये, बैठिये, जाइये” सुनकर उसे लगा मुझे पहचान लिया है। पैर पड़ गया।
पत्नी → सच्चे सत्संग से झूठे 3 शब्द ले आये तो चोर शरणागत हो गया। यदि सच्चे शब्द ले आओगे तो चारों चोर (क्रोध, मान, माया, लोभ) शरणागत हो जायेंगे।
(आतिफ – कनाडा)
“क्षमा” शब्द “क्षम्” धातु से बना है। “क्षम” यानी धीर, पर्याप्त, अनुकूल, समर्थ।
क्षमा वही करता है जिसमें क्षमता हो।
(कमल कांत)
(यह भी कह सकते हैं… क्षमता के अनुसार क्षमा धारण करें।
क्षमता को अभ्यास से बढ़ाया भी जा सकता है)
मृत्यु भय किसे ?
जिसको जीवन से जितना मोह/ लगाव होता है, उतना ही उसे मृत्यु से भय लगता है।
जिसको “जीवन (शरीर)” से नहीं बल्कि “जीव” से लगाव होता है उसे भय नहीं होता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
स्थान तथा रूप परिवर्तन ही कार्य होता है।
क्षु.श्री जिनेन्द्र वर्णी जी
जीना चाहूँ तो
जीना चढ़ने हेतु
वरना क्या जीना !
आचार्य श्री विद्यासागर जी
ज्ञान का समताभावी रुप… चारित्र,
शंका रहित रूप……………. श्रद्धा।
शांतिपथ प्रदर्शक
दिमाग को खूब पढ़ाना,
पर दिल को अनपढ़ ही रखना;
ताकि भावनाओं को समझने में हिसाब-किताब न करे।
(एकता- पुणे)
शिक्षक जो सिखाये।
टीचर जो पढ़ाये।
गुरु जो चलाये।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
दो प्रकार का…
1. आत्मा का स्वभाव… फलों को खाकर दयापूर्वक गुठली बो देना।
2. वस्तु का स्वभाव…..फलों के पेड़ फल पैदा करते हैं अपनी संतति बढ़ाने।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
क्या हम ऐसी जगह को छोड़ना नहीं चाहेंगे जहाँ सड़न/ बदबू आना शुरू हो रही हो ?
यदि हाँ, तो आत्मा मरते हुए शरीर को क्यों नहीं छोड़ेगी !
चिंतन
खुशनसीब वह नहीं जिसका नसीब अच्छा है,
बल्कि वह जो अपने नसीब को अच्छा मानता है।
(महेन्द्र जैन- नयाबाजार मंदिर)
रिक्त को भरने की मनाही नहीं, अतिरिक्त में दोष है।
फिर चाहे वह भोजन हो या धन।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
(आचार्य श्री की कला …रिक्त को अतिरिक्त से भर देते हैं)
5 पाप बीमारियां हैं। 4 (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील) के तो लक्षण दिखते हैं/ इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं, बाहर से कोई इलाज नहीं कर सकता।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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