Month: December 2025

संज्ञा / क्रिया

संज्ञा तो हर संसारी जीव में पायी जाती हैं (10वें गुणस्थान तक)। पर जब वे क्रिया रूप में परिवर्तित होती हैं तब घातक हो जाती

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भक्ति

आचार्य श्री विद्यासागर जी (…ऐसी प्रकृतियों का बंध होता है…)।

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9 लब्धि

भोग और उपभोग लब्धियाँ तीर्थंकरों को ही होती हैं। सामान्य केवलियों के भी पूरी 9 लब्धि होती हैं, पर अंतरंग। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ

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विशालता

विशालता जिसकी कोई सीमा ना हो जैसे आकाश/ विचार/ भगवान का सुख, ज्ञान। एक रूप/ न वृद्धि/ न ह्रास। संसारी सुख कम-ज्यादा इसलिए विशाल नहीं।

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तत्त्व चर्चा

जिनको तत्त्वों में श्रद्धा न हो, उनके साथ तत्त्व चर्चा करने से –> वचन व्यय। संताप। अपवाद (कुप्रभावना तथा धर्म की अविनय होती है)। आर्यिका

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जियो और जीने दो

साधु का “जियो” कमज़ोर*, गृहस्थ का “जीने दो”। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी * अपने शरीर पर ध्यान कम, आत्मा/ धर्म/ समाज पर अधिक।

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भरत / बाहुबली

बाहुबली जी के दीक्षा के समय हालाँकि भरत मौजूद थे। पर उन्हें बाहुबली जी कि एक साल के उपवास/तप के नियम के बारे में पता

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अनन्त

अनन्त संख्या को कैसे समझें ? अनन्त वह जिसमें आय न हो, सिर्फ़ व्यय ही व्यय हो पर संख्या अनन्त रहे, जैसे भविष्य आज अनन्त

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निगोद जाना/आना

तीव्र मिथ्यात्व/पाप निगोद जाने के कारण हैं। निकलने के कारण –> त्रस आयुबंध + कषाय की मंदता। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 25)

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मंदिर

जब कण-कण में भगवान है तो मंदिर जाना क्यों ? हवा तो धूप में भी पर उसका आनंद छाँव में ही क्यों / कार में

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मंगल आशीष

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December 31, 2025