संसार में पुण्य का महत्त्व ज़्यादा है, प्रमादी को भी लाभ होता है,
परमार्थ में प्रमादी की प्रगति नहीं ।

रत्नत्रय – 3

भीष्म और जटायु ने अपने-अपने जीवनकाल में एक एक पाप/पुण्य किये थे –
भीष्म ने समय पर क्रोध ना करने का पाप,
जटायु ने क्रोध करने का पुण्य ।

एक का मरण बाणों पर, दूसरे का श्री राम की गोद में ।

जीवन से प्रेम तो साधू ही करते हैं क्योंकि वे उसकी क़ीमत जानते हैं/सुख में रहते हैं ।
भिखारी/दुखी के मरने पर सब संतोष करते हैं – अच्छा हुआ छूट गया ।

मुनि श्री सुधासागर जी

गाना जल्दी जल्दी गाओ तो आनंद नहीं आता ।
भक्ति का प्रभाव इसलिये नहीं हो रहा क्योंकि हम जल्दी-जल्दी निपटा रहे हैं, भाव सहित नहीं कर रहे हैं ।

बच्चे रेत में बड़ी मेहनत से घरौंदे बनाते हैं, उन्हें प्रेम भी करते हैं, किसी को छूने भी नहीं देते हैं; पर चलते समय ख़ुद ही उसे तोड़कर हँसते हुये चले जाते हैं ।

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