मुँह में मिश्री डालकर…
चाहे घूमें,
चाहे बैठ जायें,
चाहे लेट जायें ।
पर जब तक मुँह में मिश्री है तब तक मुँह मीठा रहेगा ।
इसी प्रकार सुमिरन है ।
जब हम चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, यानि हम जिस स्थिति में भी हों,
सुमिरन करते रहेंगे, तो उस मिश्री की तरह नाम का मिठास हमारी आत्मा को आता ही रहेगा ।
(नीलम)
लंबी अवधि की संगति से ही संस्कार बनते हैं ।
चिंतन
जो Best पुरुषार्थ के बाद शेष रह जाये, वह नियति है ।
चिंतन
युवावस्था के विकल्प वृद्धावस्था/मरणावस्था के समय बहुत प्रबल बनकर उभरने लगते हैं, क्योंकि उस समय और कुछ करने को रहता ही नहीं है ।
“शब्द” मुफ़्त में मिलते हैं ।
लेकिन
उनके चयन पर “निर्भर” करता है,
कि
उनकी क़ीमत “मिलेगी”
या
“चुकानी” पड़ेगी ..
(अंजू जैन)
ख़्वाहिशें मनुष्य को जीने नहीं देतीं
और
मनुष्य ख़्वाहिशों को मरने नहीं देता ।
(श्रीमती शर्मा)
माँ-बाप के साथ हमारा सलूक…
एक ऐसी कहानी है, जिसे लिखते तो हम हैं
लेकिन
हमारी संतान हमें पढ़कर सुनाती है ।
(धर्मेंद्र)
ख़तरे के निशान के
बहुत क़रीब बह रहा है
उम्र का पानी ;
और,
वक़्त की बरसात है कि
थमने का नाम ही नहीं ले रही ।
(श्री जे.पी.शर्मा)
कुछ नादान बच्चे सब्ज़ी बेच रहे थे !
किसी ने पूछा :- “पालक” है क्या ?
बच्चों का जवाब सुनकर मन भर आया,
बोले…
“पालक” होते तो
सब्जी क्यों बेचते !
(धर्मेंद्र)
स्वभाव कभी बदलता नहीं,
उसमें निखार/मलिनता लायी जा सकती है ।
भ्रमर जैसा होना चाहिए ।
जोंक जैसा नहीं, ऐसी प्रवृत्ति तो त्याज्य है ।
परिस्थिति को मन:स्थिति न बनने देना ।
क्षु. श्री ध्यानसागर जी
यदि इनसान की तरह बोलना नहीं आता, तो जानवर की तरह मौन रहना सीख लो ।
सकारात्मकता ही धर्म है ।
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