यदि आपको कोई छोटा दिखाई दे रहा है तो इसके दो ही मतलब हैं –
या तो आप उसे दूर से देख रहे हैं ,
या गुरूर से।
(मंजू)
सदपुरुष का – जीओ और जीने दो,
महापुरुष का – जीओ और जीना सिखाओ ।
चिंतन
दुनिया को सुधारना बहुत आसान है,
शर्त एक ही है कि इस सुधार की शुरुआत खुद अपने से हो।
(मंजू)
टूटी कलम और गैरों से जलन,
हमें खुद का भाग्य नहीं लिखने देतीं।
(हिना)
(जलन स्याही को सुखा देती है)
अंधकार में दिखायी नहीं देता, तीव्र प्रकाश में भी नहीं ।
अज्ञानी भटकता है, अतिज्ञानी भी (घमंड़ से) ।
चिंतन
विपरीत परिस्थितियों से डरो मत, पर बचो,
सिर पर आ ही जाये तो सहो (समतापूर्वक) ।
चिंतन
Don’t climb mountain to show the world,
but climb to see the world.
(Arvind Barjatya)
गाय का दूध निकालना – प्रकृति,
दूध का फटना – विकृति,
दूध से घी निकालना – संस्कृति ।
प्रकृति को विकृति से बचायें, संस्कृति की रक्षा हो जायेगी ।
संस्कृति/संस्कार माँ है , इसकी Market Value नहीं होती, Moral Value होती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
क्रोध आँधी है।
अपने साथ विवेक तथा बुध्दि को उड़ा ले जाती है।
आँधी के निकल जाने के बाद पता लगता है कि आँधी अपने साथ क्या क्या बहुमूल्य चीजों को उड़ा ले गयी।
(दिव्या – लंदन)
मक्खन निकालने की बिलौनी जैसा होना चाहिये विचार-विमर्श ।
एक तरफ की ड़ोरी खिंचे तो दूसरी ओर की ढ़ीली हो, तब मक्खन निकलेगा ।
यदि दोनों ओर से रस्सी को अपनी अपनी ओर खींचते ही रहे ,तो कुछ भी सारगर्भित नहीं निकलेगा, सिर्फ समय की बर्बादी होगी ।
(रस्सी टूट जायेगी, गांठ वाली ड़ोरी से फिर मक्खन नहीं निकलेगा/आगे के विचार-विमर्श से भी कुछ हासिल नहीं हो पायेगा)
Life is “Exp+Exp+Exp”.
Yesterday is Experience.
Today is Experiment.
Tomorrow is Expectation.
Use your EXPERIENCE in your EXPERIMENT to Achieve your EXPECTATIONS……
संसार रूपी वृत से, बिंदु रूपी स्वयं की ओर आने की यात्रा ही सार्थक है ।
संसार को समेटने की इच्छा से, अपने आप में सिमटना है ।
चिंतन
केला खाने के बाद छिलका गाय को, तो दानी ।
कचरे में, तो भोगी ।
सड़क पर, तो नाशी ।
कम से कम छिलके का तो सदुपयोग कर लो ।
मुनि श्री कुंथुसागर जी
“The great thing a little lamp can do, which the big sun cannot do is –
it gives light when it is dark”.
No one is superior by size, but by purpose.
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