(एकता- पुणे)

( यदि सहायता करने वाले की खुद की स्थिति भी खराब हो तो दुगनी इज़्ज़त कीजिए)

व्रती अपने व्रतों का रक्षण व पालन वैसे ही करते हैं जैसे माता-पिता अपने बच्चों का पालन (आगे बढ़ाने) तथा रक्षण (सही भोजन,पढ़ाई आदि)।
बच्चे रक्षण तो पसंद करते हैं पर पालन नहीं। व्रती भी प्राय: पालन में उत्साह कम रखते हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

अशुभ निमित्तों से भावनाओं को खराब होने मत दो।
ऐसे Object को देखते ही सुधार प्रक्रिया शुरु कर दो। जैसे युवा वेश्या का शव दिख जाए तो विचारें – काश ! ये अपने स्वस्थ शरीर को तप/ संयम में लगाती!

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

लोभ को पाप का बाप क्यों कहा ?
क्योंकि लोभ के लिये अपमान को पी जाते हैं,
लोभ से ही मायाचारी आती है,
लोभ असफल होने पर क्रोध आता है ।

आर्यिका श्री स्वस्तिभूषणमति माताजी

कुसंगति के प्रभाव से बचे रहने के लिये बहुत पुरुषार्थ करना होता है।
लेकिन सुसंगति के बावजूद व्यक्ति बिगड़ जाए तो पुरुषार्थहीन ही कहलायेगा।
ऐसे वातावरण में यदि प्रगति नहीं की तो पुरुषार्थ की भारी कमी।

चिंतन

भिखारी वह जो इच्छा रखता हो/ जिसकी इच्छा पूरी न हुई हो।
आदर्श भिखारी…. शांति की इच्छा रखने वाला, शांति मिल जाने पर इस इच्छा को भी छोड़ने को तैयार।

क्षु.श्री जिनेन्द्र वर्णी जी

पानी अग्नि के सम्पर्क से गर्म तो हो जाता है, पर स्वाद आदि गुण नहीं बदलते हैं।
जुआरी की संगति से युधिष्ठर जुए में सब कुछ हारे पर अन्य गुण प्रभावित नहीं हुए।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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