Category: वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
अनुराग
धर्मानुराग – धर्म के प्रति ऐसा अनुराग जो विपत्ति में भी बना रहे । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी (अंधानुराग – अधर्म को भी धर्म
संसार
अपने पराये का भेद ही संसार है । असल में ना कोई अपना है, ना पराया; सब अपने अपने हैं । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
धर्म / दर्शन / अध्यात्म
धर्म को विचार, दर्शन को विश्वास, और आध्यात्म को आचरण कहते हैं । गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
चोरी और अचौर्य
बिना अनुमति दूसरे की चीज़ लेना चोरी, पर बिना अनुमति, दूसरे की वस्तु के ग्रहण का, भाव भी नहीं करना, अचौर्य – धर्म । गुरुवर
शाश्वत
मैं परिवर्तन में जीता हूं और मौत से बेहद डरता हूं (हालाँकि मौत भी बदलाव है) यह सोचकर कि शाश्वत में जीना-मरना दोनों मुश्किल हैं…
शीशा देने वाला
जब भी मैं रोया करता, माँ कहती… ये लो शीशा, देख इसमें कैसी तो लगती है ! रोनी सूरत अपनी, अनदेखे ही शीशा मैं सोच-सोचकर
नियम
नियम सब हमने बनाए हैं ताकि हम बने रह सकें, लेकिन हो यह रहा है कि नियम तो बनते जा रहे हैं लेकिन हम टूटते
नियम
नियम इसलिये बने हैं ताकि हम बनें रह सकें…. लेकिन हो यह रहा है कि नियम तो बनते जा रहे हैं, लेकिन हम टूटते जा
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