Category: डायरी

सिर झुकाना

सिर झुकाने की ख़ूबसूरती भी क्या कमाल की होती है.. धरती पर सर रखो और दुआ आसमान में क़बूल होती है । (मंजु)

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आलोचक

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है कि ना तो हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं , और ना ही स्वयं

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भारतीय संस्कृति

राम के बिना मांगे, राज्य दिया; माँ, बिना मांगे भोजन देती है; भगवान से मांगने की जरूरत नहीं, बिना मांगे मिलेगा ।

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आलोचना

ज्योति की कालिख़, धुंआ है । (मानवीय गुणों की कालिख़ आलोचना है) मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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सुख / आनंद

अकारण सुख प्राप्ति को आनंद कहते हैं। (श्रीमति शर्मा) कारणों में सुख ढूढना बंद कर दें, तब आत्मा का स्वाभाविक आनंद स्वत: ही आने लगेगा।

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क्रोध

अज्ञानी दूसरों पर क्रोध करता है, ज्ञानी अपने पर ।

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मंगल आशीष

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