Category: डायरी
सत्संग
अंतरंग का परिवर्तन सत्संग से ही संभव है । परिवर्तन से ही परिवर्धन होता है । संत ना बन सकें तो सज्जन तो बन सकते
पदयात्रा
पहले समय में पदयात्रा मज़बूरी थी, आज तप/धर्म है । धर्म की भावना देर तक चलती है । अहिंसा का पालन होता है ।
भाग्य / पुरुषार्थ
भाग्य = अलग अलग size के घड़े । पुरुषार्थ = अपने अपने घड़ों को कम ज्यादा भरना । सौरभ – नोयड़ा
सुख/दु:ख और धर्म
दुखी न होना ही, सुखी होना है । सुखी रहना ही धर्म है ।। (धर्मेंद्र)
दिगम्बरत्व
आ. शांतिसागर जी महाराज जब हैदराबाद में प्रवेश किये तो कुछ लोगों ने निज़ाम से उन पर रोक लगाने को कहा । तब निज़ाम ने
गृहस्थ और साधु
बीज और खेत गृहस्थ के, फसल (धर्म की) उगाता है साधु, खाते दोनों मिलकर हैं ।
मन और तन
चक्की के दो पाटों में से एक स्थिर और दूसरा गतिमान हो…… तभी अनाज पिसता है । इसी प्रकार मनुष्य में भी दो पाट होते
धार्मिक क्रियायें
ये भय/अभाव के निवारण के लिये नहीं, बल्कि निर्भय होने तथा प्राप्ति की अभिलाषा ही समाप्त करने के लिये होती हैं ।
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