Category: डायरी
सत्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… झूठ यदि सफ़ेद हो सकता है तो सत्य को कड़वा कहने में क्या दुविधा ! पर सत्य होता
आदमियत
एक आदमी था। राजा बनते ही आदमी मर गया, राजा जीता रहा। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
कर्म / धर्म
कर्म करना ज्यादा महत्वपूर्ण या धर्म करना ? क्या धर्म कर्म नहीं ? क्या कर्म धर्ममय नहीं हो सकता ? कितना, कब, क्यों और कौन
अंतराय
आचार्य श्री विद्यासागर जी से प्रश्न किया कितने लोग मुनिराजों के चतुर्मास के लिए प्रयास करते हैं, पहले से घोषणा कर दी जाए तो उनके
उपयोग
शांतिधारा(भगवान के ऊपर जल ढालना) करते समय जल की धारा टूटने पर प्रायश्चित बहुतों ने लिया क्योंकि उसका उपयोग टूट गया था। पर गुरु के
मान
मान भी बुरा नहीं, बस विवेक रखना है कि कहाँ पर/ अभिप्राय क्या है ! मान को प्रामाणिक बना लें। आत्मकेंद्रित(Self oriented) बुरा नहीं, स्वार्थी(Selfish)
दुर्जन
दुर्जन कौन ? जो दूषित भोजन करता हो। आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… दुर्जन को पहचानना कठिन, बचना भी कठिन। व्यक्ति दुर्जन से
आचरण
पहाड़ चढ़ते समय जितने-जितने चोटी के करीब आएंगे उतना-उतना स्पेस कम होता जाएगा/ भावनाएं बढ़ती जाएंगी। चोटी पर बने रहने के लिए संतुलन की बहुत
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