Category: वचनामृत – अन्य
प्रेम/राग
जिसमें आकुलता, वह राग । जिसमें निराकुलता, वह प्रेम । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
परिवर्तन
परिवर्तन पीड़ादायक नहीं, परिवर्तन का विरोध पीड़ादायक होता है। गौतमबुद्ध
धर्माचरण
धर्माचरण का उद्देश्य पाप काटना हुआ तो फल आधा मिलेगा, पाप त्यागने का उद्देश्य हुआ तो फल पूरा तथा तुरंत शुरू । मुनि श्री प्रमाणसागर
पद
लंका विजय के बाद श्री राम सबको दो पद (राजा/मंत्री) दे रहे थे । हनुमान ने भी दो पद माँगे, वे पद थे – श्री
जीवन
जीवन समस्या नहीं, रहस्य है; जिसे आपको सुलझाना है। स्वामी विवेकानंद जी
शांति
साधनों से शांति नहीं मिलती, साधना से मिलती है । मुनि श्री विश्रुतसागर जी
कष्ट
कष्ट सहे बिना कोई इष्ट और मिष्ट नहीं बन सकता । मुनि श्री कुंथुसागर जी
धन/धर्म
धार्मिक क्रियाओं के लिये धन चाहिये, धन के लिये धार्मिक क्रियायें । पर स्व-धर्म के लिये धन की जरूरत नहीं है । मुनि श्री विश्रुतसागर
दृष्टि
दूसरों में झाँकना छोड़ो, अपने को आंकना शुरू करो । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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