Category: वचनामृत – अन्य

कर्तृत्व/कर्तव्य

कर्तृत्व में कर्ता का भाव है, अहम् है, कर्तव्य में बिना पाने की इच्छा के सेवा भाव है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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गुरू

शिष्य को गुरू कुछ देते नहीं हैं, सिर्फ पहचानने की कला बता देते हैं । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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Nimitta

My pain be the reason for somebody’s laugh. But my laugh must never be the reason for somebody’s pain. – Aacharya Vishudh Sagar Ji

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धर्म

धर्म जीवन नहीं देता है, जीने की कला देता है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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संग्रह

स्वागत सबका, संग्रह किसी का भी नहीं। मुनि श्री प्रमाणसागर

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धर्म

धर्म स्वर्ग पाने के लिये नहीं जीवन को स्वर्ग बनाने के लिये होता है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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तप

घी और रूई मंगल नहीं हैं, पर जब दीपक  में जलने लगती हैं, तो मंगल बन जाती हैं । तप का यही महत्व है । मुनि

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पुण्य

चित्त की प्रसन्नता/पवित्रता ही पुण्य है । आचार्य श्री विभवसागर जी

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दु:ख

दु:ख आयें तो पाप क्रियाओं को दूर करें, क्योंकि दु:ख आते ही पूर्व के पापकर्मों से हैं । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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विनय

विनय सबसे बड़ा और सबसे कम मेहनत वाला तप है । मुनि श्री सौम्यसागर जी

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मंगल आशीष

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