Category: वचनामृत – अन्य

धर्म

कमल खिलता है सूर्य के निमित्त से, बढ़ता है कीचड़ के निमित्त से, वही कमल यदि धर्म रूपी ड़ंठल से अलग हो जाये तो वही

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धर्म/अधर्म

अधर्म = बदला लेना, धर्म   = अपने आपको बदल लेना । आर्यिका श्री पूर्णमती माताजी

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वैराग्य

कमल कीचड़ में पैदा होता है, कीचड़ में बढ़ता है, पर कीचड़ से निर्लिप्त रहता है । हम लोग भी संसार में पैदा होते हैं,

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कर्तव्य

बच्चों को मैच पर निबंध लिखने को मिला । आलसी बच्चा एक लाईन लिखकर आया -“बारिश की वज़ह से मैच रद्द हो गया ।” हम

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राग

कोई किसी के लिये नहीं रोता । रोते हैं, अपने राग के कारण । ज्ञानी के परिवारजनों का भी विछोह होता है, वह क्यों नहीं

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भजन

जब जब भोजन की याद आये, कम से कम तब तब तो भजन की याद करें । मुनि श्री सुधासागर जी

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कल्याण मार्ग

कल्याण का मार्ग एकता में है, अनेकता ही ने तो संसार बनाया है । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी

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रूप

रावण ने सीता को अपनाने के लिये जब अपना रूप राम का रखा, तब उसने कहा – “राम कौ रूप बनावत ही, मोहे मात सी

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सुख / शांति

जितनी उपेक्षा करोगे उतनी सुख,शांति पाओगे । इसका अर्थ यह नहीं कि घर वालों से संबंध ही छोड़ दें, उनसे बस मोह कम कर दें/

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मंगल आशीष

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